Page 579 Class 10 Hindi पाठ 4. नाखून क्यों बढ़ते हैं
हिंदी गोधूलि Solutions Class 10 Hindi
गद्य खण्ड
4.
नाखून क्यों
बढ़ते हैं
(हजारी प्रसाद द्विवेदी)
बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी पाठ्यपुस्तक का चौथा
अध्याय “नाखून क्यों बढ़ते
हैं” एक रोचक और विचारोत्तेजक निबंध
है। यह पाठ एक सामान्य से प्रश्न से शुरू होकर मानव विकास, संस्कृति और नैतिकता के गहरे
विषयों को छूता है। लेखक ने नाखूनों के बढ़ने के सरल से प्रश्न को लेकर मानव इतिहास, सभ्यता के विकास, और मनुष्य की आंतरिक प्रवृत्तियों
पर एक गहन चिंतन प्रस्तुत किया है। यहाँ हमने आपको नाखून क्यों बढ़ते हैं Question
Answer भी उपलब्ध करवाएं
हैं।
प्रश्न 1: नाखून क्यों बढ़ते
हैं? यह प्रश्न लेखक
के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
उत्तर:- नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे उनकी
बेटी ने पूछा था। एक दिन उसकी बेटी ने उसे यह सवाल किया, जिसने लेखक को इस विषय पर
गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।
प्रश्न 2: बढ़ते नाखूनों द्वारा
प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?
उत्तर:- बढ़ते नाखून हमें हमारे प्राचीन
काल की याद दिलाते हैं, जब मनुष्य वनमानुष की तरह
जंगलों में रहता था। उस समय नाखून उसकी आत्मरक्षा और शिकार के मुख्य हथियार होते थे।
आज भी नाखूनों का बढ़ना इस बात का संकेत है कि हमारे भीतर पशुता की कुछ निशानियाँ अब
भी मौजूद हैं। प्रकृति हमें यह याद दिलाती है कि भले ही हम आधुनिक हो गए हों, लेकिन हमारे भीतर के प्राचीन
गुण अभी भी जीवित हैं।
प्रश्न 3: लेखक द्वारा नाखूनों
को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है?
उत्तर:- प्राचीन काल में, जब मनुष्य जंगली जीवन जीता
था, नाखून उसकी आत्मरक्षा के मुख्य
अस्त्र थे। वे वनमानुष की तरह अपने नाखूनों से शिकार करता और अपने दुश्मनों से बचता
था। आज के आधुनिक युग में, हम विभिन्न हथियारों का उपयोग
करते हैं और नाखूनों की वह भूमिका समाप्त हो चुकी है। इसलिए, नाखूनों को अस्त्र के रूप
में देखना प्राचीन समय के लिए तो उपयुक्त है, लेकिन वर्तमान समय
में यह तर्कसंगत नहीं है।
प्रश्न 4: मनुष्य बार-बार
नाखूनों को क्यों काटता है?
उत्तर:- मनुष्य निरंतर सभ्य बनने
की कोशिश करता रहा है। प्रारंभिक काल में नाखून उसके अस्त्र होते थे, लेकिन जैसे-जैसे मानव सभ्यता
विकसित हुई, उसने नाखूनों को काटना और
उन्हें संवारना शुरू कर दिया। नाखूनों को काटकर वह पशुत्व से मुक्ति पाने और अधिक सभ्य
दिखने की कोशिश करता है। आजकल नाखून काटना सौंदर्य और स्वच्छता का प्रतीक बन गया है।
प्रश्न 5: सुकुमार विनोदों
के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध
में क्या बताया है?
उत्तर:- लेखक ने बताया है कि मानव
ने अपने नाखूनों को संवारने और उन्हें कलात्मक रूप देने की प्रक्रिया बहुत पहले ही
शुरू कर दी थी। वात्स्यायन के कामसूत्र से पता चलता है कि लगभग दो हजार वर्ष पहले भारतीय
लोग अपने नाखूनों को विभिन्न आकृतियों में संवारते थे। यह प्रक्रिया न केवल मनोरंजन
का साधन थी, बल्कि यह सौंदर्य का प्रतीक
भी थी। त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार आदि विभिन्न आकृतियों
के नाखून उन दिनों लोकप्रिय थे।
प्रश्न 6: नख बढ़ाना और उन्हें
काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं? इनका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:- नख बढ़ाना और उन्हें काटना
मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं,
जो हमारे प्राचीन
पशु जीवन की स्मृतियों को संजोए रखती हैं। नख बढ़ना हमें यह याद दिलाता है कि हमारे
पूर्वज नाखूनों का उपयोग अस्त्र के रूप में करते थे। नख काटना हमें यह बताता है कि
हम अब पशुता से आगे बढ़ चुके हैं और सभ्य बन गए हैं। यह क्रिया हमें यह एहसास दिलाती
है कि मनुष्य अपने भीतर की पशु प्रवृत्तियों को नियंत्रित करके एक सभ्य समाज का निर्माण
करता है।
प्रश्न 7: लेखक क्यों पूछता
है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की
ओर या मनुष्यता की ओर? स्पष्ट करें।
उत्तर:- लेखक के मन में यह प्रश्न
इसलिए उठता है क्योंकि वह देखता है कि आधुनिक समाज में हिंसा और विनाश के साधनों का
बढ़ता उपयोग हो रहा है। मनुष्य बंदूक, बम और अन्य विनाशकारी
हथियारों का निर्माण और उपयोग कर रहा है, जो पशुता की निशानी
है। दूसरी ओर, मनुष्य की सहानुभूति, प्रेम, और सहयोग जैसे गुण उसे मनुष्यता
की ओर बढ़ाते हैं। लेखक इस अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट करने के लिए यह प्रश्न उठाता है
ताकि लोग सोच सकें कि वे किस दिशा में बढ़ रहे हैं। पशुता की ओर बढ़ने का मतलब है हिंसा
और विनाश, जबकि मनुष्यता की ओर बढ़ने
का मतलब है प्रेम और शांति।
प्रश्न 8: देश की आजादी के
लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं?
उत्तर:- लेखक देश की आजादी के लिए
‘इंडिपेन्डेन्स’ और ‘स्वाधीनता’ शब्दों की अर्थ मीमांसा करता
है। ‘इंडिपेन्डेन्स’ का मतलब है किसी की अधीनता
से मुक्त होना, जबकि ‘स्वाधीनता’ का मतलब है अपने ही अधीन रहना।
लेखक का निष्कर्ष है कि ‘स्वाधीनता’ का अर्थ केवल बाहरी स्वतंत्रता
नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण और आत्म-बंधन
भी है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची स्वतंत्रता तभी प्राप्त होती है जब हम अपने आचरण
और कर्मों में संयम और जिम्मेदारी दिखाते हैं।
प्रश्न 9: लेखक ने किस प्रसंग
में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती? लेखक का अभिप्राय
स्पष्ट करें।
उत्तर:- लेखक ने यह प्रसंग तब कहा
जब वह बता रहा था कि पुराने रीति-रिवाज और परंपराएँ हमेशा उपयुक्त नहीं होतीं। बंदरिया
अपने बच्चे को गोद में दबाकर रखने की आदत रखती है, जो मनुष्य के लिए अनुकरणीय नहीं हो सकता। लेखक का अभिप्राय यह
है कि हमें अपनी पुरानी आदतों और परंपराओं की समीक्षा करनी चाहिए और जो उपयोगी न हो
उसे छोड़ देना चाहिए। सभी पुराने रीति-रिवाज अच्छे नहीं होते, और हमें वही अपनाना चाहिए
जो हमारे लिए लाभकारी हो।
प्रश्न 10: ‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता
लेखक क्या बताता है?
उत्तर:- लेखक के अनुसार, ‘स्वाधीनता’ का अर्थ है अपने ही अधीन रहना, जिसमें ‘स्व’ का बंधन होता है। यह हमें
आत्म-नियंत्रण और आत्म-संयम का पाठ पढ़ाती है। लेखक बताता है कि सच्ची स्वाधीनता वह
है जो हमें अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का पालन करते हुए दूसरों के कल्याण के
लिए काम करने की प्रेरणा दे। यह स्वाधीनता हमें अपने और समाज के विकास की दिशा में
आगे बढ़ने में सहायक होती है।
प्रश्न 11: निबंध में लेखक
ने किस बूढ़े का जिक्र किया है? लेखक की
दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है?
उत्तर:- लेखक ने एक बूढ़े का जिक्र
किया है जो अपनी पूरी जिंदगी का अनुभव कुछ शब्दों में व्यक्त करता है। बूढ़ा कहता है, “बाहर नहीं भीतर की ओर देखो।
हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्म-तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो।” लेखक की दृष्टि में बूढ़े
के ये कथन पूरी तरह सार्थक हैं क्योंकि वे मनुष्य को सच्ची शांति और संतोष की ओर ले
जाते हैं।
प्रश्न 12: मनुष्य की पूँछ
की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे। प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के
मन में कैसी आशा जगती है?
उत्तर:- प्राणिशास्त्रियों का अनुमान
है कि एक दिन मनुष्य के नाखून भी उसी तरह झड़ जाएँगे जैसे उसकी पूँछ झड़ गई थी। इस
अनुमान से लेखक के मन में यह आशा जगती है कि भविष्य में मनुष्य पूरी तरह से पशुता को
त्याग देगा। नाखूनों का झड़ना यह संकेत देगा कि मनुष्य अपनी आदिम प्रवृत्तियों से पूरी
तरह मुक्त होकर एक अधिक सभ्य और मानवीय जीवन की ओर बढ़ जाएगा।
प्रश्न 13: ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक
अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है?
उत्तर:- लेखक के अनुसार, ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ में अंतर है। ‘सफलता’ का मतलब है बाहरी साधनों और
उपलब्धियों से प्राप्त की गई उपलब्धि। लेकिन ‘चरितार्थता’ का अर्थ है प्रेम, मैत्री, और सभी के कल्याण के लिए अपने
को समर्पित करना। नाखूनों को काट देना भी ‘स्व’-निर्धारित आत्म-बंधन का फल
है, जो हमें सच्ची चरितार्थता
की ओर ले जाता है। लेखक बताता है कि चरितार्थता बाहरी सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है
क्योंकि यह आत्मा की पूर्णता और मानवीय मूल्यों पर आधारित होती है।
प्रश्न 14. व्याख्या करें
(क) काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर
लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर।
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी
पाठ्यपुस्तक ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ से ली गई हैं। लेखक की बेटी
के नाखून बढ़ने के सवाल पर लेखक विचार करने लगता है। इस विचार के बीच यह पंक्ति उभरकर
आती है जो नाखून और अपराधी की तुलना करती है। लेखक का मानना है कि जैसे नाखून काटने
पर भी बार-बार बढ़ते रहते हैं,
वैसे ही निर्लज्ज
अपराधी सजा स्वीकार करने के बाद भी अपनी अपराध की आदत नहीं छोड़ते। यह पंक्ति मनुष्य
की पाशविक प्रवृत्तियों को उजागर करती है जो बार-बार सुधार के प्रयासों के बावजूद बदलती
नहीं हैं। लेखक ने इस तुलना से यह बताने का प्रयास किया है कि जैसे नाखून बार-बार बढ़ते
हैं, वैसे ही मनुष्य की विनाशकारी
प्रवृत्तियाँ भी बार-बार उभरती रहती हैं।
(ख) मैं मनुष्य के नाखून की
ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ।
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी
पाठ्यपुस्तक ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ से ली गई हैं। लेखक ने इन
पंक्तियों में मनुष्य की बर्बरता और हिंसक प्रवृत्तियों को नाखून के माध्यम से व्यक्त
किया है। नाखून को देखकर लेखक को कभी-कभी निराशा होती है क्योंकि यह उसे मनुष्य की
आदिम और विनाशकारी प्रवृत्तियों की याद दिलाता है। उदाहरण के तौर पर, हिरोशिमा पर बम गिराने जैसी
घटनाएँ मानवता की बर्बरता को उजागर करती हैं। यह पंक्ति मनुष्य की अमानवीयता, हिंसा, और अदूरदर्शिता को दर्शाती
है, जिससे लेखक को निराशा होती
है। लेखक यह बताना चाहता है कि मनुष्य की यह बर्बरता उसकी प्रगति और सभ्यता के बावजूद
पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
(ग) कमबख्त नाखून बढ़ते हैं
तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं
देगा।
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी
पाठ्यपुस्तक ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों
में लेखक द्विवेदीजी यह बताना चाहते हैं कि भले ही नाखून बार-बार बढ़ते हैं, परंतु मनुष्य उन्हें बढ़ने
नहीं देगा। लेखक का कहना है कि आज का मनुष्य सभ्य, संवेदनशील और बुद्धिजीवी हो गया है। वह नरसंहार और विनाश के
भयानक परिणामों से अवगत है। हिरोशिमा के महाविनाश ने उसे जागरूक बना दिया है। इसलिए, वह अपनी विनाशकारी प्रवृत्तियों
को नियंत्रित कर, सृजनात्मकता की ओर अग्रसर
हो रहा है। यह पंक्ति इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य अब अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को
नियंत्रित कर, मानव मूल्यों और शांति की
ओर बढ़ना चाहता है। वह नाखूनों की तरह अपनी विनाशकारी प्रवृत्तियों को बढ़ने नहीं देगा
और उन्हें काटता रहेगा।
प्रश्न 15: लेखक की दृष्टि
में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:- लेखक की दृष्टि में हमारी
संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता अपने आप पर अपने द्वारा लगाए गए बंधन में निहित है।
भारतीय चित्त अनधीनता के बजाय स्वाधीनता के रूप में सोचता है। यह हमारी संस्कृति का
ही प्रभाव है कि हम स्वतंत्रता को अपने अंदर की अनुशासन और आत्म-संयम के माध्यम से
समझते हैं। भारतीय संस्कृति के दीर्घकालीन संस्कारों ने हमें यह सिखाया है कि स्व के
बंधन को आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता है। यह विशेषता हमें अपनी परंपराओं और मूल्यों
से जोड़े रखती है और हमें नैतिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाती है। इस प्रकार, लेखक का मानना है कि हमारी
संस्कृति का आत्म-नियंत्रण और स्व-अनुशासन ही हमारी सबसे बड़ी विशेषता है।
प्रश्न 16: मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश
हो जाता हूँ। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:- प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक
‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ से उद्धृत है। इस अंश में
प्रख्यात निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाखूनों के माध्यम से मनुष्य की सभ्यता
और संस्कृति की विकास यात्रा को उजागर किया है। नाखूनों को बार-बार काटने के बावजूद
उनके पुनः बढ़ने की प्रवृत्ति को लेखक ने मनुष्य की पाशविकता और बर्बरता के प्रतीक
के रूप में देखा है। यह पंक्ति लाक्षणिक दृष्टि से लिखी गई है, जिसमें लेखक अपनी निराशा व्यक्त
करते हैं कि सभ्यता के विकास के बावजूद मनुष्य की प्राचीन बर्बरता समाप्त नहीं हुई
है। हिरोशिमा जैसी घटनाएँ मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति का उदाहरण हैं। लेखक इस बात से
निराश होते हैं कि मनुष्य की यह बर्बरता अभी भी जीवित है और बार-बार उभरती रहती है, जैसे नाखून बार-बार बढ़ते
रहते हैं।
प्रश्न 17: ‘नाखून क्यों बढ़ते
हैं’ का सारांश प्रस्तुत
करें।
उत्तर:- ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ एक गद्य पाठ है जिसमें लेखक
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाखूनों के बढ़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य
की बर्बरता और पाशविक प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया है। लेखक की बेटी के सवाल “नाखून क्यों बढ़ते हैं?” के उत्तर में लेखक ने मनुष्य
की प्राचीन आदिम प्रवृत्तियों पर विचार किया है। उन्होंने बताया कि जैसे नाखून बार-बार
काटने पर भी बढ़ते रहते हैं,
वैसे ही मनुष्य की
विनाशकारी प्रवृत्तियाँ भी बार-बार उभरती रहती हैं। लेखक ने यह भी दर्शाया कि सभ्यता
के विकास के बावजूद मनुष्य की पाशविकता समाप्त नहीं हुई है और वह अभी भी हिंसा और विनाश
की ओर प्रवृत्त होता है। लेखक ने अपने चिंतन के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास
किया है कि मनुष्य को अपनी विनाशकारी प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर सृजनात्मकता की
ओर बढ़ना चाहिए।
भाषा की
बात
प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों
के वचन बदलें ।
उत्तर:-
अल्पज्ञ – अल्पज्ञों
प्रतिद्वंद्वियों – प्रतिद्वंद्वी
हड्डि – हड्डियाँ
मुनि – मुनियों
अवशेष – अवशेष
वृतियों – वृत्ति
उत्तराधिकार- उत्तराधिकारियों
बंदरिया – बंदर
प्रश्न 2. वाक्य-प्रयोग द्वारा
निम्नलिखित शब्दों के लिंग-निर्णय करें ।
उत्तर:-
बंदूक – बंदूक छूट गया।
घाट – घाट साफ है।
सतह – सतह चिकना है।
अनुसधित्सा- अनुसंधिसा की
इच्छा है।
भंडार – भंडार खाली है।
खोज – खोज पुराना है।
अंग – अंग कट गया।
वस्तु – वस्तु अच्छा है।
प्रश्न 3. निम्नलिखित वाक्यों में क्रिया की काल रचना स्पष्ट
करें।
(क) उन दिनों उसे जूझना पड़ता
था। – भूतकाल
(ख) मनुष्य और आगे बढ़ा – भूतकाल
(ग) यह सबको मालूम है। – वर्तमान कार्ल
(घ) वह तो बढ़ती ही जा रही
है। – वर्तमान काल
(ङ) मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं
देगा। – भविष्य काल
प्रश्न 4. ‘अस्त्र-शस्त्रों
का बढ़ने देना मनुष्य की अपनी इच्छा की निशानी है और उनकी बाढ़ को रोकना मनुष्यत्व
का तकाजा है। इस वाक्य में आए विभक्ति चिन्हों के प्रकार बताएँ।
उत्तर:-
शस्त्रों का – षष्ठी विभक्ति
मनुष्य की – षष्ठी विभक्ति
इच्छा की – षष्ठी विभक्ति
उनकी – षष्ठी विभक्ति
बाढ़ को – द्वितीया विभक्ति
मनुष्यत्व का- षष्ठी विभक्ति।
प्रश्न 5. स्वतंत्रता, स्वराज्य जैसे शब्दों की तरह ‘स्व’ लगाकर पाँच शब्द
बनाइए।
उत्तर:- स्वधर्म, स्वदेश, स्वभाव, स्वप्रेरणा, स्वइच्छा।
प्रश्न 6. निम्नलिखित के विलोम
शब्द लिखें ।
उत्तर:-
पशुता – मनुष्यतां
घृणा – प्रेम
अभ्यास – अनभ्यास
मारणास्त्र – तारणस्त्र
ग्रहण – उग्रास
मूढ – ज्ञानी
अनुवर्तिता – परवर्तिता
सत्याचरण – असत्याचरण
गिद्यांशों
पर आधारित अर्थग्रहण-संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
कुछ लाख ही वर्षों की बात
है जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा उसे नाखून की
जरूरत थी. उसकी जीवन-रक्षा के लिये नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे।
दाँत भी थे, पर नाखून के बाद ही उसका स्थान
था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था। प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ना पड़ता था। नाखून उसके
लिए आवश्यक अंग था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा।
पत्थर के ढेले और पेड़ की डालें काम में लाने लगा (रामचंद्र जी की वानरी सेना के पास
ऐसे ही अस्त्र थे।) उसने हड्डियों के भी हथियार बनाए। इन हड्डी के हथियारों में सबसे
मजबूत और सबसे ऐतिहासिक का देवताओं के राजा का वज्र, जो दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था। मनुष्य और आगे बढ़ा। उसने
धातु के हथियार बनाए।
जिनके पास लोहे के अस्त्र
और शस्त्र थे, वे विजयी हुए। देवताओं के
राजा तक को मनुष्यों के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी कि मनुष्यों के पास लोहे
के अस्त्र थे। असुरों के पास । अनेक विद्याएँ थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे, शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं। आर्य
विजयी हुए। फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया। नाग हारे, सुपर्ण हारे, यक्ष हारे, गंधर्व हारे, असुर हारे, राक्षस हारे। लोहे के अस्त्रों
ने बाजी मार ली। इतिहास आगे बढ़ा। पलीतेवाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों में इतिहास
को किस कीचड़भरे घाट तक घसीटा है,
यह सबको मालूम है।
नखधर मनुष्य अब एटम बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़
रहे हैं।
अब भी प्रकृति मनुष्य को उसके
भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है, अब भी वह याद दिला
देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष के पहले के नख-दंतावलंबी
जीव हो पशु के साथ एक ही सतह पर विचरण करने वाले और चरने वाले।
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक
का नाम लिखिए।
(ख) मनष्य को कब
और क्यों नाखन की आवश्यकता थी
(ग) वज्र किसका हथियार
था और वह कैसा था?
(घ) असुरों में अनेक
विद्याएँ थीं फिर भी आर्यों से क्यों पराजित हुए ?
(ङ) अब भी प्रकृति
मानव को क्या याद दिला देती है ?
(च) लेखक ने नख-दंतावलंबी
जीव किसे कहा है ?
उत्तर:-
(क) पाठ का नाम- नाखून क्यों
बढ़ते हैं।
लेखक का नाम- हजारी प्रसाद
द्विवेदी।
(ख) जब मनुष्य वनमानुष जैसा
जंगली था तब उसे नाखून की आवश्यकता थी क्योंकि मानव नाखून की सहायता से जंगली जीवों
से रक्षा करता था; भोजन उपलब्धि में जीवों को
मारने में सहायता लेता था।
(ग) वज्र इन्द्र का हथियार
था और वह दधीचि की हड्डियों से बना था।
(घ) असुरों के पास अनेक विधाएँ
थीं, पर लोहे के अस्त्र नहीं थे।
शायद घोड़े भी नहीं थे। आर्यों के पास ये दोनों चीजें थीं इसी कारण आर्य विजयी हुए
और असुर पराजित।।
(ङ) मानव को प्रकृति अब भी
याद दिला देती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम्हारे अन्दर अब भी
पशुता विद्यमान है।
(च) मनुष्य को।
2. मानव शरीर का अध्ययन करनेवाले
प्राणिविज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्तं . – की भाँति मानव शरीर में बहुत-सी
अभ्यास-जन्य सहज वृत्तियाँ रह गई हैं। दीर्घकाल तक उनकी आवश्यकता रही है। अतएव शरीर
ने अपने भीतर एक ऐसा गुण पैदा कर लिया है कि वे वृत्तियाँ अनायास ही, और शरीर के अनजाने में भी, अपने-आप काम करती हैं। नाखून
का बढ़ना उसमें से एक है, केश का बढ़ना दूसरा, दाँत का दुबारा उठना तीसरा
है, पलकों का गिरना चौथा है। और
असल में सहजात वृत्तियाँ अनजान स्मृतियों को ही कहते हैं।
हमारी भाषा में इसके उदाहरण
मिलते हैं। अगर आदमी अपने शरीर की, मन की और वाक् की
अनायास घटने वाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले।
पर कौन सोचता है ? सोचना तो क्या उसे इतना भी
पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण
है।
उनहें काटने की जो प्रवृत्ति
हैं, वह उसकी मनुष्यता की निशानी
है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता।
उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधिनी है।
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक
का नाम लिखिए।
(ख) प्राणि विज्ञानियों
का वृत्तियों के बारे में क्या मत है ?
(ग) लेखक का नख बढ़ाने
की प्रवृत्ति से क्या अभिप्राय है?
(घ) मानव शरीर में
विद्यमान सहजात वृत्तियाँ क्या-क्या हैं ?
(ङ) नख काटने की
प्रवृत्ति किसकी निशानी है?
(च) कौन-सी प्रवृत्ति
मनुष्यता की विरोधिनी है ?
(छ) मनुष्य को अपनी
वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में क्या मददगार होगा?
उत्तर:-
(क) पाठ का नाम- नाखून क्यों
बढ़ते हैं।
लेखक का नाम- हजारी प्रसाद
द्विवेदी।
(ख) प्राणी विज्ञानियों का
निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति शरीर में भी बहुत-सी अभ्यासजन्य सहज वृत्तियाँ
विद्यमान हैं। ,
(ग) लेखक नख बढ़ाने की प्रवृत्ति
को मानव में अंतर्निहित पशुत्व का प्रमाण मानते हैं।
(घ) नाखून का बढ़ना, केश का बढ़ना, पलकों का गिरना, दाँत का दुबारा उठना इत्यादि
मानव शरीर में विद्यमान सहजात वृत्तियाँ हैं।
(ङ) नख काटने की प्रवृत्ति
मनुष्यता की निशानी है।
(च) अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति
मनुष्यता की विरोधिनी है।
(छ) अगर मनुष्य अपने शरीर की; मन की और वाणी की अनायास घटनेवाली
वृत्तियों के विषय में विचार करे,
तो उसे अपनी वास्तविक
प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले।
3. सोचना तो. क्या उसे इतना भी
पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण
है। उन्हें काटने की जो प्रवृत्ति है, वह उसकी मनुष्यता
। की निशानी है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका
है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने
– की प्रवृत्ति मनुष्यता की
क्रोिधिनी है।
प्रश्न-
(क) प्राणीविज्ञानी
के अनुसार मानव की सहजात वृत्ति क्या है?
(ख) मनुष्यता की
विरोधिनी क्या है?
(ग) नाखून बढ़ना
और नाखून काटना किसकी निशानी है ?
(घ). ‘पशु बनकर वह आगे
नहीं बढ़ सकता’-स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:-
(क) प्राणीविज्ञानी के अनुसार
मानव की सहजात वृत्ति नाखून बढ़ाना है।
(ख) अस्त्र-शस्त्र जमा करना
मनुष्यता की विरोधिनी है।
(ग) प्राणीविज्ञानी के अनुसार
नाखून बढ़ाना मानव की सहजात वृत्ति है। यदि मनुष्य नाखून काटता है तो काटने की प्रवृत्ति
मनुष्यता की निशानी है।
(घ) आदिकाल में मनुष्य को हिंसक
होने की जरूरत थी इसलिए उसके बार-बार नाखून उग आए परन्तु आज मनुष्य सभ्य हो चुका है।
वह हिंसा की भावना को नष्ट कर देना चाहता है क्योंकि उसे पता है कि वह हिंसा या पशुता
के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। उसे यह भी ज्ञान है कि
अस्त्र-शस्त्र जमा करना मानवता का विरोध करना है।
4. हमारी परंपरा महिमामकी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार
उज्ज्वल हैं। हमारे अनजाने में भी ये बातें एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती
हैं। यह जरूर है कि परिस्थितियों बदल गई हैं। उपकरण नए हो गए हैं और उलझनों की मात्रा
भी बहुत बढ़ गई है, पर मूल समस्याएं बहुत अधिक
नहीं बदली हैं। भारतीय चित्त जो आज भी अधीनता’ के रूप में न सोचकर
‘स्वाधीनता’ के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों
का फल है। वह ‘स्व’ के बंधन को आसानी से छोड़
नहीं सकता। अपने-आप पर अपने-आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी
विशेषता है।
प्रश्न
(क) पाठ और लेखक
के नाम लिखें।
(ख) हमारी परम्परा
कैसी है?
(ग) भारतीय चित्त
में ‘स्व’ का भाव किसका प्रतिफल
है?
(घ) गद्यांश का भावार्थ
लिखें।
उत्तर:-
(क) पाठ- नाखून क्यों बढ़ते
हैं।लेखक- हजारी प्रसाद द्विवेदी।।
(ख) हमारी भारतीय परम्परा महिमामयी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार
उज्ज्वल हैं। यह . हमारे अनजाने में ही एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती है।
(ग) भारतीय चित्त में ‘स्व’ का भाव हमारे दीर्घकालीन संस्कारों
का फल है।
(घ) हमारी महिमामयी परंपरा
और उज्ज्वल संस्कार ही एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देते हैं। परिस्थितियों भले
बदल गई हैं, पर समस्याएं बदली नहीं हैं।
हमारे मानस में ‘स्व’ का जो भाव है, जो आत्म-बंधन की स्वीकृति
है, वह दीर्घकालीन संस्कारों का
फल है।
5. जातियाँ इस देश में अनेक आई
हैं। लड़ती-झगड़ती भी रही हैं,
फिर प्रेमपूर्वक बस
भी गई हैं। सभ्यता की नाना सीढ़ियों पर खड़ी और नाना और मुख करके चलनेवाली इन जातियों
के लिए सामान्य धर्म खोज निकालना कोई सहज बात नहीं थी।
भारतवर्ष के ऋषियों ने अनेक
प्रकार से इस समस्या को सुलझाने की कोशिश की थी। पर एक बात उन्होंने लक्ष्य की थी।
समस्त वर्णों और समस्त जातियों का एक सामान्य आदर्श भी है। वह है अपने ही बंधनों से
अपने को बाँधना। मनुष्य पशु से किस बात से भिन्न है। आहार-निद्रा आदि पशु-सुलभ स्वभाव
उसके ठीक वैसे ही हैं, जैसे अन्य प्राणियों के। लेकिन
वह फिर भी पशु से भिन्न हैं।
उसमें संयम है, दूसरे के सुख-दुख के प्रति
संवेदना है, श्रद्धा है, तप है, त्याग है। वह मनुष्य के स्वयं
के उद्भावित बंधन हैं। इसीलिए मनुष्य झगड़े-टंटे को अपना आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़-दौड़ने-वाले
अविवेकी को बुरा समझता है और वचन,
मन और शरीर से किए
गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं
है। यह मनुष्यमात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सब वर्गों
का सामान्य धर्म कहा है
प्रश्न-
(क) मनुष्य को संयमित
करनेवाला कौन-सा बंधन है ?
(ख) मनुष्य किन गुणों
के कारण पशुओं से भिन्न माना जाता है ?
(ग)लेखक ने ‘स्वाधीनता’ को भारतीय संस्कृति
का सबसे बड़ा गुण क्यों माना है ?
(घ) गलत आचरण किसे
माना गया है ?
उत्तर:-
(क) मनुष्य को संयमित करनेवाला
बंधन ‘स्व’ है। मनुष्य इस बंधन को स्वयं
ही स्वीकार करता है। यही हमारी संस्कृति की विशेषता है।
(ख) लेखक के अनुसार आहार, निद्रा आदि पशुओं जैसी आदतें
मनुष्य की भी है परन्तु
संयम, तप, त्याग, सुख-दुख के प्रति संवेदना
आदि गुण उसे पशुओं से भिन्न बनाते हैं।
(ग) ‘स्वाधीनता’ का अर्थ है अपने ऊपर लगाया
गया बंधन। अपने पर अपने द्वारा रोक लगाना भारतीय परंपरा है। मन में क्रोध आना पशुता
की निशानी है परन्तु विवेक द्वारा संयमित करना मनुष्यता है।
(घ) वचन, मन और शरीर से किये गये असत्याचरण
को गलत आचरण माना गया है।
6. मनुष्य को सुख कैसे मिलेगा? बड़े-बड़े नेता कहते हैं, वस्तुओं की कमी है, और मशीन बैठाओ, और उत्पादन बढ़ाओ, और धन की वृद्धि करो और बाह्य
उपकरणों की ताकत बढ़ाओ। एक बूढा था। उसने कहा था–बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो। हिंसा को
मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो; आत्म-तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो।
उसने कहा-प्रेम ही बड़ी चीज
है, क्योंकि वह हमारे भीतर है।
उच्छृखलता पशु की प्रवृत्ति है,
‘स्व’ का बंधन मनुष्य का स्वभाव
है। बूढ़े की बात अच्छी लगी या नहीं, पता नहीं। उसे गोली
मार दी गई। आदमी के नाखून बढ़ने की प्रवृत्ति ही हावी हुई। मैं हैरान होकर सोचता हूँ
बूढ़े ने कितनी गहराई में पैठकर मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता का पता लगाया था।
प्रश्न-
(क) बड़े-बड़े नेताओं
ने क्या कहा है ?
(ख) बूढ़ा कौन था? उसने क्या-क्या
करने की सीख दी है ?
(ग) “एक बूढ़ा था”-लेखक ने किस बूढ़े
की ओर संकेत किया है ?
(घ) लेखक हैरान होकर
क्यों सोचता है ?
उत्तर:-
(क) बड़े-बड़े नेताओं ने मशीन
बैठाने, उत्पादन बढ़ाने, धन की वृद्धि करने और बाह्य
उपकरणों की ताकत बढ़ाने को कहा है।
(ख) बूढ़ा सत्य और अहिंसा का
पुजारी था। यहाँ उसने बाहर नहीं,
भीतर की ओर देखने, हिंसा को मन से दूर करने, मिथ्या को हटाने, क्रोध और द्वेष को दूर करने, लोक के लिए कष्ट सहने, प्रेम.की बात सोचने, उच्छृखलता को छोड़कर ‘स्व’ को अपनाने की सीख दी है।
(ग) ‘एक बूढ़ा था’-वाक्यांश में लेखक ने महात्मा
गाँधी की ओर संकेत किया है।
(घ) बूढ़े द्वारा अच्छी बातें
समझाने पर भी उसे गोली मारी गई। पशुता. या हिंसा को जितनी बार भी समाप्त करने का प्रयास
किया जाता है, वह बढ़ती जाती है। वास्तविक
चरितार्थता का पाठ पढ़ानेवाला भी गोली का ही शिकार हुआ। लोगों की ऐसी पशुवृत्ति को
देखकर लेखक हैरान हो जाता है।
7. सफलता और चरितार्थता में अंतर
है। मनुष्य मरणास्त्रों के संचयन से, बाह्य उपकरणों के
बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर
के साथ सफलता नाम दे रखा है। परंतु मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, त्याग में है, अपने को सबके मंगल के लिए
नि:शेष भाव से दे देने में है। नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का
परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले
आना वाहती है, उसको काट देना उस ‘स्व-निर्धारित आत्म-बंधन का
फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले
जाती है।
प्रश्न-
(क) मनुष्य की चरितार्थता
किसमें है?
(ख) मनुष्य ने सफलता
का नाम किसे दे रखा है ?
(ग) नाखूनों का बढ़ना
और नाखूनों का कटना किस चीज का परिचायक है ?
(घ) सफलता और चरितार्थता
में क्या अन्तर है?
उत्तर:-
(क) मनुष्य की चरितार्थता आपसी
प्रेम, मित्रता और त्याग पर निर्भर
करती है वास्तव में उसी का जीवन सफल है. जो दूसरे की भलाई के लिए अपना सर्वस्व समर्पित
कर दे।
(ख) मनुष्य मरणास्त्रों के
संचयन से बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु में भी पा सकता है, जिसे उसने बड़े आडंबर के साथ
अर्जित किया है। इसी रूप को मनुष्य ने सफलता का नाम दे रखा है।
(ग) नाखूनों का बढ़ना उस हिंसा
का परिणाम है जिसके सहारे वह सफलता पाना चाहता है। दूसरी ओर नाखूनों को काटना आत्म-निर्धारित
बंधन का फल है। मनुष्य को अपने बनाए गए बंधनों में ही बंधकर रहना चाहिए तभी मनुष्य-जीवन
सफल है।
(घ) अपने बंधन में बंधकर जीवनयापन
करना ही सफलता हैं जबकि चरितार्थता आपसी प्रेम, मित्रता और त्याग
पर निर्भर करती है। परहित के लिए सर्वस्व अर्पित कर देना ही चरित्रार्थता है।
वस्तुनिष्ठ
प्रश्व
सही विकल्प चुनें-
प्रश्न 1.‘नाखून क्यों
बढ़ते हैं किस प्रकार का निबंध है?
(क) ललित
(ख) भावात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) विवरणात्मक
उत्तर:- (क) ललित
प्रश्न 2. हजारी प्रसाद द्विवेदी
किस निबंध के रचयिता हैं ?
(क) नागरी लिपि
(ख) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(ग) परंपरा का मूल्यांकन
(घ) शिक्षा और संस्कृति
उत्तर:- (ख) नाखून क्यों बढ़ते हैं
प्रश्न 3. अल्पज्ञ पिता कैसा
जीव होता है ?
(क) दयनीय
(ख) बहादुर
(ग) अल्पभाषी
(घ) मृदुभाषी
उत्तर:- (क) दयनीय
प्रश्न 4. दधीचि की हड्डी
से क्या बना था?
(क) तलवार
(ख) त्रिशूल
(ग) इन्द्र का वज्र
(घ) कुछ भी नहीं
उत्तर:- (ग) इन्द्र का वज्र
प्रश्न 5.‘कामसूत्र’ किसकी रचना है ?
(क) वात्स्यायन
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) भीमराव अंबेदकर
(घ) गुणाकर मूले
उत्तर:- (क) वात्स्यायन
II. रिक्त स्थानों की
पूर्ति
प्रश्न 1. हर……..”दिन नाखून बढ़ जाते हैं।
उत्तर:- तीसरे
प्रश्न 2. सहजात वृत्तियाँ……”स्मृतियों को कहते हैं।
उत्तर:- अनजान
प्रश्न 3. अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति………..विरोधी है।
उत्तर:- मनुष्यता
प्रश्न 4.“इण्डिपेण्डेन्स’ का अर्थ है…………..।
उत्तर:- अनधीनता
प्रश्न 5.‘स्व’ का बंधन ……….. का स्वभाव है।
उत्तर:- मनुष्य
अतिलघु उत्तरीय
प्रश्न
प्रश्न 1. जंगली मनुष्य को नाखून की
जरूरत क्यों थी ?
उत्तर:- उसकी (जंगली मनुष्य) जीवन-रक्षा
के लिए नाखून बहुत जरूरी था।
प्रश्न 2. मनुष्य का नाखून
बढ़ना किस वृत्ति का परिचायक है ?
उत्तर:- नाखून बढ़ना मनुष्य की पाशविक
वृत्ति का परिचायक है।
प्रश्न 3. हड्डी के हथियारों
में सबसे मजबूत हथियार किसकी हड्डी से बना था?
उत्तर:- हड्डी के हथियारों में सबसे
मजबूत हथियार दधीचि मुनि की हड्डियों से बना था।
प्रश्न 4. हिरोशिमा का हत्याकांड
किसका जीवंत प्रतीक है ?
उत्तर:- हिरोशिमा का हत्याकांड मनुष्य
की भयंकर पाशविक वृत्ति का जीवंत प्रतीक है।
प्रश्न 5. भारतीय संस्कृति की क्या विशेषता
है ?
उत्तर:- भारतीय संस्कृति की विशेषता
है अपने-आप पर अपने-आप लगाया हुआ बंधना
प्रश्न 6. भले और मूढ़ लोगों
में क्या अन्तर है ?
उत्तर:- भले लोग अच्छे-बुरे की जाँच
कर हितकर को ग्रहण करते हैं और मूढ़ लोग दूसरों के इशारों पर भटकते रहते हैं।
प्रश्न 7. महाभारत में सामान्य
धर्म किसे कहा गया है?
उत्तर:- महाभारत में निर्वैर भाव, सत्य और क्रोधहीनता को सामान्य
धर्म कहा गया है।
प्रश्न 8. मनुष्य का स्वधर्म
क्या है ?
उत्तर:- अपने आप पर संयम और दूसरे
के मनोभावों का समादर करना मनुष्य का स्वधर्म है।
नाखून क्यों
बढ़ते हैं लेखक परिचय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
का जन्म सन् 1907 ई० में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर । प्रदेश) में
हुआ । द्विवेदी जी का साहित्य कर्म भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास की रचनात्मक परिणति
है । संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, बांग्ला आदि भाषाओं व उनके
साहित्य के साथ इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान
की व्यापकता व गहनता में पैठकर उनका अगाध पांडित्य नवीन मानवतावादी सर्जना और आलोचना
की क्षमता लेकर प्रकट हुआ है। वे ज्ञान को बोध और पांडित्य की सहृदयता में दाल कर एक
ऐसा रचना संसार हमारे सामने उपस्थित करते हैं जो विचार की तेजस्विता, कथन के लालित्य और बंध की
शास्त्रीयता का संगम है । इस प्रकार उनमें एकसाथ कबीर, तुलसी और रवींद्रनाथ एकाकार
हो उठते हैं। उनकी सांस्कृतिक दृष्टि अपूर्व है। उनके अनुसार भारतीय संस्कृति किसी
एक जाति की देन नहीं, बल्कि समय-समय पर उपस्थित
अनेक जातियों के श्रेष्ठ साधनांशों के लवण-नीर संयोग से विकसित हुई हैं।
द्विवेदीजी की प्रमुख रचनाएँ
हैं – ‘अशोक के फूल’, ‘कल्पलता’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कुटज’,’विचार-प्रवाह’, ‘आलोक पर्व’, ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ (निबंध संग्रह); ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारुचंद्रलेख’, ‘पुनर्नवा’, ‘अनामदास का पोथा’ (उपन्यास); ‘सूर साहित्य’, ‘कबीर’, ‘मध्यकालीन बोध का स्वरूप’, ‘नाथ संप्रदाय’, ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘हिंदी साहित्य : उद्भव और
विकास’ (आलोचना-साहित्येतिहास); ‘संदेशरासक’, ‘पृथ्वीराजरासो’, ‘नाथ-सिद्धों की बानियाँ'(ग्रंथ संपादन): ‘विश्व भारती’ (शांति निकेतन) पत्रिका का
संपादन । द्विवेदीजी को आलोकपर्व’ पर साहित्य अकादमी
पुरस्कार, भारत सरकार द्वारा ‘पद्मभूषण’ सम्मान एवं लखनऊ विश्वविद्यालय
द्वारा डी० लिट् की उपाधि मिली । वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय, . चंडीगढ़ विश्वविद्यालय आदि
में प्रोफेसर एवं प्रशासनिक पदों पर रहे । सन् 1979 में दिल्ली में उनका निधन हुआ।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली
से लिए गए प्रस्तुत निबंध में प्रख्यात लेखक और निबंधकार का मानववादी दृष्टिकोण प्रकट
होता है । इस ललित निबंध में लेखक ने बार-बार काटे जाने पर भी बढ़ जाने वाले नाखूनों
के बहाने अत्यंत सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकाम-गाथा उद्घाटित कर दिखायी
है। एक ओर नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की आदिम पाशविक वृत्ति और संघर्ष चेतना का प्रमाण
है तो दूसरी ओर उन्हें बार-बार काटते रहना और अलंकृत करते रहना मनुष्य के सौंदर्यबोध
और सांस्कृतिक चेतना को भी निरूपित करता है । लेखक ने नाखूनों के बहाने मनोरंजक शैली
में मानव-सत्य का दिग्दर्शन कराने का सफल प्रयत्न किया है। यह निबंध नई पीढ़ी में सौंदर्यबोध, इतिहास चेतना और सांस्कृतिक
आत्मगौरव का भाव जगाता है।
नाखून क्यों
बढ़ते हैं - पाठ का सारांश
बच्चे कभी-कभी चक्कर में डाल
देने वाले प्रश्न कर बैठते हैं। मेरी छोटी लड़की ने जब उस दिन पूछ.दिया कि आदमी के
नाखून क्यों बढ़ते हैं, तो मैं सोच में पड़ गया, हर तीसरे दिन नाखून बढ़ जाते
हैं, बच्चे कुछ दिन तक अगर उन्हें
बढ़ने दें, तो माँ-बाप अकसर उन्हें डाँटा
करते हैं। पर कोई नहीं जानता कि ये अभागे नाखन क्यों इस प्रकार बढ़ा करते हैं। काट
दीजिए वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे पर निर्लज्ज अपराधी की भांति फिर छूटते ही सेंध
पर हाजिर।
कुछ लाख ही वर्षों की बात
है, जब मनुष्य जंगली था; वनमानुष जैसा। उसे नाखून की
जरूरत थी। उसकी जीवन-रक्षा के लिए नाखून बहुत जरूरी थे। असल में वही उसके अस्त्र थे।
दाँत भी थे पर नाखून के बाद ही उनका स्थान था। उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, प्रतिद्वंदियों को पछाड़ना
पड़ता था, नाखून उसके लिए आवश्यक अंग
था। फिर धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। पत्थर के ढेले
और पेंड की डालें काम में लाने लगा। उसने हड्डियों के भी हथियार बनाये। मनुष्यं और
आगे बढ़ा। उसने धातु के हथियार बनाए। पलीतेवाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने, बमों ने, बमवर्षक वायुयानों ने इतिहास
को किस कीचड़ भरे घाट पर घसीटा है, यह सबको मालूम है।
नखधर मनुष्य अब एटम बम पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़
रहे थे।
कुछ हजार साल पहले मनुष्य
ने नाखून को सुकुमार विनोदों के लिए उपयोग में लाना शुरू किया था। वात्स्यायन के कामसूत्र
से पता चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पहले का भारतवासी नाखूनों को जम के संवारता था।
उनके काटने की कला काफी मनोरंजक बताई गई है। त्रिकोण, वर्तुलाकार, चंद्राकार दंतुल आदि विविध
आकृतियों के नाखून उन दिनों विलासी नागरिकों के न. जाने किस काम आया करते थे। उनको
सिक्थक (मोम) और अलंक्तक (आलता) से यत्नपूर्वक रगड़कर लाल और चिकना बनाया जाता था।
गौड़ देश के लोग उन दिनों बड़े-बड़े नखों को , पसंद करते थे और दक्षिणात्य
लोग छोटे नखों को। लेकिन समस्त अधोगामिनी वृत्तियों को और नीचे खींचनेवाली वस्तुओं
को भारतवर्ष ने मनुष्योचित बनाया है, यह बात चाहूँ भी तो
भूल नहीं सकता।
15 अगस्त को जब अंगरेजी भाषा
के पत्र ‘इण्डिपेण्डेन्स की घोषणा कर
रहे थे, देशी भाषा के पत्र ‘स्वाधीनता दिवस की चर्चा कर
रहे थे। इण्डिपेण्डेन्स का अर्थ है स्वाधीनता ‘शब्द का – अर्थ है अपने ही अधीन’ रहना। उसने अपने आजादी के
जितने भी नामकरण किए, स्वतंत्रता, स्वराज्य, स्वाधीनता-उन सबमें ‘स्व’ का बंधन अवश्य रखा। अपने-आप
पर अपने-आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है।
मनुष्य झगड़े-डंटे को अपना
आदर्श नहीं मानता, गुस्से में आकर चढ़-दौड़ने
वाले अविवेकी को बुरा समझता है और वचन, मन और शरीर से किए
गए असत्याचरण को गलत आचरण मानता है। यह किसी भी जाति या वर्ण या समुदाय का धर्म नहीं
है। यह मनुष्यमात्र का धर्म है। महाभारत में इसीलिए निर्वैर भाव, सत्य और अक्रोध को सब वर्गों
का सामान्य धर्म कहा है –
एतद्धि विततं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु
भारत!
निर्वैरता महाराज सत्यमक्रोध
एव च।
अन्यत्र इसमें निरंतर दानशीलता
को भी गिनाया गया है। गौतम ने ठीक ही कहा था कि मनुष्य – की मनुष्यता यही है कि वह
सबके दुःख-सुख को सहानुभूति के साथ देखता है।
ऐसा कोई दिन आ सकता है, जबकि मनुष्य के नाखूनों का
बढ़ना बंद हो जाएगा। प्राणिशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि मनुष्य का अनावश्यक अंग
उसी प्रकार झड़ जाएगा, जिस प्रकार उसकी पूँछ झड़
गई है। उस दिन मनुष्य की पशुता भी लुप्त हो जाएगी। शायद उस दिन वह मारणास्त्रों का
प्रयोग भी बंद कर देगा। .
नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की
उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में
सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना उस ‘स्व’-निर्धारित आत्म-बंधन का पुल
है, जो .. उसे चरितार्थता की ओर
ले जाती है। कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े, मनुष्य उन्हें बढ़ने
नहीं देगा।
शब्दार्थ
अल्पज्ञ : कम जाननेवाला
दयनीय : दया करने योग्य
बेहया : बिना हया के, निर्लज्ज, वेशर्म
प्रतिद्वंद्वी : विरोधी
नखधर : नख को धारण करनेवाला, नाखून वाला
दंतावलंबी : दाँत का सहारा
लेकर जीने वाला
विचरण : घूमना, भटकना
तत:किम : फिर क्या, इसके बाद क्या
असह्य : न सह सकने योग्य
पाशवी वृत्ति : पशु जैसा स्वभाव
एवं आचरण
वर्तुलाकार : घुमावदार, गोलाकार
दंतुल : दाँत वाला, जिसके दाँत बाहर निकले हों
दाक्षिणात्य : दक्षिण का
(दक्षिण भारतीय)
अभोगामिनी : नीचे की ओर जानेवाली
सहजात वत्ति : जन्म के साथ
पैदा होने वाली वृत्ति या स्वभाव
वाक : वाणी, भाषा
निर्बोध : नासमझ, नादान
अनुवर्तिता.: पीछे-पीछे चलना
अरक्षित : जो रक्षित न हो, खुला
अनुसैधित्सा : अनुसंधान की
प्रबल इच्छा
सरबस : सर्वस्व, सबकुछ
पर्वसंचित : पहले से इकट्ठा
या जमा किया हुआ
समवेदना : दूसरे के दुख को
महसूस करना
उद्भावित : प्रकट की गयी, उत्पन्न की गयी
असत्याचरण : असत्य आचरण, लोकविरुद्ध आचरण
निर्वैर : बिना वैर-विरोध
के
उत्स : स्रोत, उद्गम, मूल
आत्मतोषण : अपने को संतुष्ट
करना, अपने को समझाना ।
चरितार्थता : सार्थकता
नि:शेष : जिसका शेष भी न बचे.
सम्पर्ण
तकाजा : माँग
The End
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