Page 583 Class 10 Hindi पाठ 8 – “जित-जित मैं निरखत हूँ”

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गद्य खण्ड

8 – “जित-जित मैं निरखत हूँ

पंडित बिरजू महाराज (साक्षात्कार)

 

बिहार बोर्ड कक्षा 10 हिंदी पाठ्यपुस्तक का आठवाँ अध्याय जित-जित मैं निरखत हूँ भारतीय शास्त्रीय नृत्य के महान कलाकार पंडित बिरजू महाराज के जीवन और कला यात्रा पर आधारित है। यह पाठ एक साक्षात्कार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें बिरजू महाराज अपने बचपन, परिवार, संघर्षों और कला के प्रति समर्पण के बारे में बताते हैं। उनके जीवन की कहानी एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे कठिन परिस्थितियों में भी अपनी कला और लगन के बल पर सफलता प्राप्त की जा सकती है। यहाँ हमने आपको जित-जित मैं निरखत हूँ Question Answer भी उपलब्ध करवाएं हैं।


प्रश्न
1. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है ?

उत्तर:- बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ में हुआ था, जो उत्तर प्रदेश की राजधानी और कथक नृत्य का एक प्रमुख केंद्र है। रामपुर से उनका गहरा संबंध था, क्योंकि वे वहाँ काफी समय तक रहे और उनकी बहनों का जन्म भी रामपुर में हुआ था। रामपुर में ही उन्होंने अपने नृत्य कौशल को निखारा और नवाब के दरबार में प्रदर्शन किया।

 

प्रश्न 2. रामपुर के नवाब की नौकरी छुटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया ?

उत्तर:- रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद इसलिए चढ़ाया गया क्योंकि यह नौकरी परिवार के लिए एक बोझ थी। बिरजू महाराज छह साल की उम्र से ही नवाब के यहाँ नाचते थे, जिससे उनकी माँ परेशान थीं। उनके पिता हनुमान जी से नौकरी छूटने की प्रार्थना करते थे। जब नौकरी छूटी, तो उन्होंने राहत महसूस की और आभार स्वरूप हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया।

 

प्रश्न 3. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके सम्पर्क में आए ?

उत्तर:- बिरजू महाराज ने अपनी औपचारिक नृत्य शिक्षा दिल्ली में निर्मला जी के स्कूल हिंदुस्तानी डांस म्यूजिक से शुरू की। यह संस्था उनके नृत्य कौशल को निखारने में महत्वपूर्ण साबित हुई। वहाँ उन्हें कपिला वात्स्यायन और लीला कृपलानी जैसी प्रसिद्ध हस्तियों के साथ काम करने का अवसर मिला, जिन्होंने उनके कलात्मक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

प्रश्न 4. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला?

उत्तर:- बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार कलकत्ता (अब कोलकाता) में मिला। इस प्रदर्शन में उन्होंने अपने चाचा शम्भू महाराज और पिता (बाबूजी) के साथ नृत्य किया था। यह पुरस्कार उनके परिवार की नृत्य परंपरा और बिरजू महाराज की प्रतिभा का प्रमाण था, जो उनके भविष्य की सफलता का संकेत था।

 

प्रश्न 5. बिरजू महाराज के गुरु कौन थे ? उनका संक्षिप्त परिचय दें।

उत्तर:- बिरजू महाराज के प्रमुख गुरु उनके पिता (बाबूजी) थे। वे एक कुशल नर्तक और शिक्षक थे, जिन्होंने बिरजू को कथक की बारीकियाँ सिखाईं। बाबूजी स्वभाव से शांत और धैर्यवान थे, जो अपने दुःख को कभी व्यक्त नहीं करते थे। उन्हें कला से गहरा प्रेम था। दुर्भाग्य से, जब बिरजू महाराज साढ़े नौ साल के थे, तब उनके बाबूजी की मृत्यु हो गई। इस छोटी सी अवधि में ही उन्होंने बिरजू को नृत्य की मजबूत नींव दी।


प्रश्न
6. बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देने शुरू की?

उत्तर:- बिरजू महाराज ने लगभग 1956 के आसपास रश्मि जी को नृत्य की शिक्षा देनी शुरू की। उस समय महाराज एक ऐसे शिष्य की तलाश में थे, जो उनकी कला को आगे बढ़ा सके। रश्मि जी को उन्होंने अपनी कला का उपयुक्त वाहक समझा और उन्हें शिक्षा देने का निर्णय लिया। यह महाराज के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जहाँ वे एक कलाकार से गुरु की भूमिका में प्रवेश कर रहे थे।

 

प्रश्न 7. बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुःखद, समय कब आया ? उससे संबंधित प्रसंग का वर्णन कीजिए।

उत्तर:- बिरजू महाराज के जीवन का सबसे दुःखद समय उनके पिता की मृत्यु के समय आया। उस समय वे केवल साढ़े नौ साल के थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे। इस कठिन परिस्थिति में, बिरजू महाराज ने दस दिनों के भीतर दो नृत्य कार्यक्रम किए और 500 रुपये जुटाए। इस पैसे से उन्होंने पिता का दसवाँ और तेरहवाँ संस्कार किया। यह घटना उनके जीवन की कठोर वास्तविकता और कला के प्रति समर्पण को दर्शाती है।

 

प्रश्न 8. शंभू महाराज के साथ बिरजू महाराज के संबंध में प्रकाश डालिए।

उत्तर:- शंभू महाराज बिरजू महाराज के चाचा और गुरु थे। बचपन से ही शंभू महाराज ने बिरजू को नृत्य की शिक्षा दी। भारतीय कला केंद्र में दोनों एक साथ काम करते थे, जहाँ बिरजू ने शंभू महाराज के सहायक के रूप में अपनी कला को निखारा। शंभू महाराज के मार्गदर्शन ने बिरजू महाराज के कलात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

प्रश्न 9. कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर:- कलकत्ता में एक सम्मेलन में बिरजू महाराज के प्रदर्शन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस प्रदर्शन की व्यापक सराहना हुई और अखबारों में इसकी चर्चा छा गई। यह घटना उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसके बाद से उनकी ख्याति बढ़ती गई और वे निरंतर प्रगति करते रहे।

 

प्रश्न 10. संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या क्या थी?

उत्तर:- संगीत भारती में बिरजू महाराज 250 रुपये मासिक वेतन पर कार्यरत थे। वे दरियागंज में रहते थे और प्रतिदिन बस नंबर 5 या 9 से संगीत भारती पहुँचते थे। हालाँकि, वहाँ उन्हें प्रदर्शन के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते थे। अंततः, इस स्थिति से निराश होकर उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी।

प्रश्न 11. बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे।

उत्तर:- बिरजू महाराज कई वाद्य यंत्रों में निपुण थे। वे सितार, गिटार, हारमोनियम, बाँसुरी, तबला और सरोद बजाने में दक्ष थे। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण है।

 

प्रश्न 12. अपने विवाह के बारे में बिरजू महाराज क्या बताते हैं ?

उत्तर:- बिरजू महाराज का विवाह 18 वर्ष की आयु में हुआ, जिसे वे अपनी गलती मानते थे। उनके पिता की मृत्यु के बाद माँ ने घबराकर जल्दबाजी में शादी करवा दी। महाराज मानते थे कि इतनी कम उम्र में विवाह ने उनके करियर को प्रभावित किया और उन्हें नौकरी करने पर मजबूर किया।

 

प्रश्न 13. बिरजू महाराज की अपने शागिर्दो के बारे में क्या राय है?

उत्तर:- बिरजू महाराज अपने शिष्यों पर गर्व करते थे। उन्होंने रश्मि वाजपेयी को शाश्वती की उपाधि दी थी। अन्य प्रमुख शिष्यों में वैरोनिक, फिलिप, मेक्लीन, टॉक, तीरथ प्रताप प्रदीप और दुर्गा शामिल थे। महाराज अपने शिष्यों की प्रगति और उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण की सराहना करते थे।


(क) पांच सौ रुपए देकर मैंने गण्डा बंधवाया।

व्याख्या- यह कथन बिरजू महाराज द्वारा अपने गुरु-शिष्य संबंध का वर्णन करता है। बिरजू महाराज के पिता, जो उनके प्रथम गुरु थे, ने गुरु-दक्षिणा के रूप में 500 रुपये मांगे। यह राशि बिरजू महाराज ने दो प्रदर्शनों से अर्जित की। गंडा बांधना एक पारंपरिक रीति है जो शिष्य को गुरु के प्रति समर्पण दर्शाती है। इस घटना से गुरु-शिष्य परंपरा की पवित्रता और महत्व का पता चलता है। यह दर्शाता है कि कला की शिक्षा में पारिवारिक संबंधों से ऊपर गुरु-शिष्य का संबंध होता है।

 

(ख) मैं कोई चीज चुराता नहीं हूँ कि अपने बेटे के लिए ये रखना है, उसको सिखाना है।

व्याख्या- यह कथन बिरजू महाराज की शिक्षण नीति और नैतिक मूल्यों को दर्शाता है। वे अपने सभी शिष्यों को, चाहे वे उनके बेटे हों या अन्य, समान रूप से और पूरी ईमानदारी से सिखाते थे। चुराना शब्द का प्रयोग यहाँ किसी कला या तकनीक को छिपाने या रोक कर रखने के संदर्भ में किया गया है। महाराज का मानना था कि कला सबके लिए समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। यह उनकी निष्पक्षता, उदारता और कला के प्रति समर्पण को दर्शाता है।


(ग) मैं तो बेचारा उसका असिस्टेंट हूँ। उस नाचने वाले कार

व्याख्या- यह कथन बिरजू महाराज की विनम्रता और कला के प्रति उनके दृष्टिकोण को प्रकट करता है। वे स्वयं को नृत्य का केवल एक माध्यम मानते थे। उस नाचने वाले से तात्पर्य नृत्य की कला से है, जिसे वे सर्वोच्च मानते थे। महाराज का मानना था कि लोग उनकी कला से प्रेम करते हैं, न कि उनसे व्यक्तिगत रूप से। यह दृष्टिकोण उनकी कला के प्रति गहन समर्पण और अहंकार से मुक्त होने की भावना को दर्शाता है। वे मानते थे कि कलाकार से बड़ी कला होती है।

 

प्रश्न 15. विग्ज महाराज अपना सबसे बड़ा जज किसको मानते थे?

उत्तर:-  बिरजू महाराज अपनी माँ को अपना सबसे बड़ा आलोचक मानते थे। वे अपने प्रदर्शन के बाद अपनी माँ से अपनी कमियों और अच्छाइयों के बारे में पूछते थे। उनकी माँ बिरजू महाराज के प्रदर्शन की तुलना उनके पिता (बिरजू महाराज के प्रथम गुरु) से करती थीं और सुधार के लिए सुझाव देती थीं। यह आलोचना बिरजू महाराज के कौशल को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। उनकी माँ की ईमानदार प्रतिक्रिया उनके लिए अत्यंत मूल्यवान थी।

 

 

प्रश्न 16. पुराने और आज के नर्तकों के बीच बिरजू महाराज क्या फर्क पाते हैं ?

उत्तर:- बिरजू महाराज पुराने और आधुनिक नर्तकों के बीच कई अंतर देखते थे। पुराने नर्तक कला को शौक के रूप में देखते थे और सीमित संसाधनों के बावजूद उत्साह से प्रदर्शन करते थे। वे छोटी जगहों में, बिना आधुनिक सुविधाओं के भी बेपरवाह होकर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। इसके विपरीत, आधुनिक नर्तक अधिक सुविधा-संपन्न हैं लेकिन छोटी-छोटी कमियों पर ध्यान देते हैं। बिरजू महाराज का मानना था कि आज के कलाकार मंच की तकनीकी पहलुओं पर अधिक ध्यान देते हैं, जबकि पुराने कलाकार कला के प्रति समर्पण और जुनून पर अधिक केंद्रित थे।

 

प्रश्न 17. पांच सौ रुपए देकर गण्डा बंधवाने का क्या अर्थ है?

उत्तर:- पांच सौ रुपए देकर गण्डा बंधवाना गुरु-शिष्य परंपरा में एक महत्वपूर्ण रीति को दर्शाता है। बिरजू महाराज के पिता, जो उनके प्रथम गुरु भी थे, ने यह रीति निभाई। गण्डा बांधना शिष्य को गुरु द्वारा स्वीकार करने का प्रतीक है। 500 रुपये गुरु-दक्षिणा के रूप में दिए गए, जो बिरजू महाराज ने अपने दो प्रदर्शनों से कमाए थे। यह रीति गुरु-शिष्य संबंध की पवित्रता, शिष्य का समर्पण और गुरु का आशीर्वाद दर्शाती है। यह घटना दिखाती है कि कला की शिक्षा में पारिवारिक संबंधों से ऊपर गुरु-शिष्य का संबंध होता है।

भाषा की बात

प्रश्न 1. काल रचना स्पष्ट करें

(क) ये शायद 43 की बात रही होगी।

उत्तर:- 1943 ई की।

 

(ख) यह हाल अभी भी है।

उत्तर:-  1943 ई की।

 

(ग) उस उम्र में न जाने क्या नाचा रहा होऊँगा।

उत्तर:- 5 वर्ष की उम्र में (43 ई. में)

 

(घ) अब पचास रुपये में रिक्शे पर खर्च करता तो क्या बचता, और ट्यूशन में नागा हो तो पैसा अलग काट लेते थे।

उत्तर:- 1948 ई. में।

 

(ङ) पचास रुपए में काम करके किसी तरह पढ़ता रहा मैं।

उत्तर:- 1948 ई।

 

प्रश्न 2. चौदह साल की उम्र में, जब मैं वापस लखनऊ आया फेल होकर, तब कपिला जी अचानक लखनऊ पहुंची मालूम करने कि लड़का जो है वह कुछ करता भी है या आवारा या गिटकट हो गया, वह है कहाँ।

उत्तर:- चौदह साल की उम्र में फेल होकर लखनऊ आया कपिला जी अचानकं लखनऊ आकर पता किया कि लड़का क्या कर रहा है।

 

(ख) वह तीन साल मैं खूब रियाज किया, मतलब यही सोचकर कि यही टाइम है अमर कुछ बढ़ना है तो अंधेरा करा किया करके करता था जब बाद में थक जाऊँ मैं तो जो भी साज हाथ आए कभी सितार, कभी गिटार, कभी हारमोनियम लेकर बजाऊं मतलब रिलैक्स होने के लिए।

 

उत्तर:- अंधेरा कमरा करके तीन साल मैं खूब रियाज किया और थक जाने पर सितार, गिटार, हारमोनियम रिलेक्स के लिए बजाता।

 

प्रश्न 3. पाठ से ऐसे दस वाक्यों का चयन कीजिए जिससे यह साबित होता हो कि ये वाक्य आमने-सामने बैठे व्यक्तियों के बीच की बातचीत के हैं, लिखित भाषा के नहीं।

उत्तर:-
 (क) जन्म मेरा लखनऊ के जफरीन अस्पताल में
1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे।

(ख) आपको मंच का कुछ अनुभव या संस्मरण बचपन के हैं।

(ग) आपको आगे बढ़ाने में अम्मा जी का बहुत बड़ा हाथ है।

(घ) अपने शार्गिों के बारे में बताएँ।

(ङ) अब तुम हो इतने अर्से से।

(च) शाश्वती लगी हुई है।

(छ) लड़कों में कृष्णमोहन, राममोहन को उतना ध्यान नहीं है।

(ज) आपको संगीत नाटक अकादेमी अवार्ड कब मिला। (अ) केशवभाई और मैं साथ ही रहते थे।

(अ) शागिर्द मैं बाबूजी का हूँ।

 

प्रश्न 4. निम्नलिखित वाक्यों से अव्यय का चुनाव करें।

(क) जब अंडा कहकर पूछे तो नहीं खाता था, पर जब मूंग की दाल कहें तो बड़े मजे से खा लेता था।

उत्तर:- जब, तो, पर, तो आदि।

 

(ख) एक सीताराम बागला करके लड़का था अमीर घर का।

उत्तर:- एक करके।

 

(ग) बिलकुल पैसा नहीं था घर में कि उनका दसवाँ किया जा सके।

उत्तर:- बिलकुल, जा आदि।

 

(घ) फिर जब एक साल हो गया तो कहने लगे कि अब तुम परमानेंट हो गए।

उत्तर:- फिर, जब, एक, तो, अब आदि।

गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण-संबंधी प्रश्नोत्तर

 

1.बिरजू महाराज : जन्म मेरा लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे; वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ। घर में आखिरी सन्तान। तीन बहनों के बाद। सबसे छोटी बहन मुझसे आठ नौ साल बड़ी। अम्मा तब 28 के लगभग रही होंगी। बहनों का जन्म रामपुर में क्योंकि बाबूजी यहाँ 22 साल रहे। बड़ी बहन लगभग 15 साल बड़ी। उस समय बाबूजी रायगढ़ आदि राजांओं के यहाँ भी गए। मैं डेढ़ दो साल का था। उस समय विभिन्न राजा कुछ समय के लिए कलाकारों को माँग लिया करते थे। पटियाला भी गए थे पहले। रायगढ़ दो ढाई साल रहे होंगे। रामपुर लौटकर आए। रामपुर काफी अरसे रहे। जब पाँच छह साल के थे तो अकसर नवाब याद कर लिया करते थे। हलकारे आ गए तो जाना ही पड़ता था। चाहे जो भी वक्त हो।

 

प्रश्न

(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।

(ख) बिरजू महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

(ग) महाराज अपने माता-पिता की कौन-सी संतान थे ?

(घ) महाराज की बहनों का जन्म कहाँ हुआ था?

(ङ) बडी बहन महाराज से कितने बडी थी?

(च) बाबूजी रामपुर में कितने दिन रहे थे?

उत्तर:-
(क) पाठ का नाम-जित-जित मैं निरखत हैं।

लेखक का नाम- पं बिरजू महाराज।

(ख) बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 में जफरीन अस्पताल, लखनऊ में हुआ था।

(ग) महाराज अपने माता-पिता की आखिरी संतान थे।

(घ) महाराज की बहनों का जन्म रामपुर में हुआ था।

(ङ)बड़ी बहन महाराज से लगभग 15 साल बड़ी थी।

(च) बाबूजी रामपुर में 22 साल रहे थे।

 

2. छह साल की उम्र में मैं नवाब साहब को बहुत पसंद आ मया। मैं नाचता था जाकर। पीछे पैर मोड़कर बैठना पड़ता था। चूड़ीदार पैजामा साफा, अचकन पहन कर। अम्मा जी बेचारी बहुत परेशान। उन्होंने हमारे तनख्वाह भी बाँध दी थी। बाबूजी रोज हनुमानजी का प्रसाद माँगे कि 22 साल गुजर गए, अब नौकरी छूट जाए। नवाब साहब बहुत नाराज कि तुम्हारा लड़का नहीं होगा तो तुम भी नहीं रह सकते। खैर बाबू जी बहुत खुश हुए और उन्होंने मिठाई बांटी। हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी।

 

प्रश्न

(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।

(ख) कितने साल की उम्र में महाराज नवाब को पसंद आ गये थे।

(ग) बचपन में नवाब के समक्ष क्या पहनकर महाराज नाचते थे।

(घ) बाबूजी हनुमान जी का प्रसाद क्यों मांगते थे?

(ङ) बाबूजी हनुमान जी को प्रसाद क्यों चड़ाये ?

उत्तर:-
(क)पाठ का नामजित-जित मैं निरखत हूँ। लेखक का नाम-बिरजू महाराज।

(ख) छह साल की उम्र में बिरजू नवाब को पसंद आ गये थे।

(ग) बचपन में महाराज चूड़ीदार पैजामा, साफा, अचकन पहनकर नवाब के समक्ष नाचते थे।

(घ) बाबूजीं चाहते थे कि नौकरी छूट जाए, इसलिए हनुमान जी का प्रसाद माँगते थे।

(ङ) नौकरी से जान छूटने की खुशी में हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया।

 

3. मेरी एक बड़ी खास आदत रही है, जैसे कि मेरे बाबूजी की भी थी कि जब शार्गिद को सिखा रहे हैं तो पूर्ण रूप से मेहनत कर सिखाना और अच्छा बना देना है। ऐसा बना देना कि मैं खुद हूँ। यह कोशिश है। पर अब भगवान की कृपा भी होनी चाहिए तब। मतलब कोशिश यही रहती है कि मैं कोई चीज चुराता नहीं हूं कि अपने बेटे के लिए ये रखना है उसको सिखाना है।

 

प्रश्न

(क) पाठ और वक्ता का नामोल्लेख करें।

(ख) बिरजू महाराज का यह कथन किस संदर्भ में है ?

(ग) बिरजू महाराज अपनी किस आदत के बारे में क्या बताते हैं?

उत्तर:-
(क) पाठ-जित-जित मैं निरखत हूँ। वक्ताबिरजू महाराज।

(ख) बिरजू महाराज का यह कथन शिष्यों की शिक्षा के संदर्भ में है।

(ग) बिरजू महाराज अपने शिष्यों को शिक्षा देने के संदर्भ में अपनी आदत का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अपने पिता की तरह उनकी खास आदत रही है शिष्यों को मेहनत करके सिखाना और उन्हें अच्छा अपने जैसा बनाने की चेष्टा करना है। वे कहते हैं कि वे बेटों और शिष्यों में भेद नहीं करते। वे जो अपने बेटों-बेटियों को सिखाते हैं, वह सब कुछ अपने शिष्यों को भी सिखाते हैं।

 

4. बि.म:-अम्माजी का बहुत बड़ा हाथ है। अम्माजी ने तो शुरू से उन बुजुर्गों की तारीफ कर करके मेरे सामने हरदम कि, बेटा वो ऐसे थे, उनको कम-से-कम इतना नाम तो याद था उन बुजुर्गों का। अभी आप दूसरे किसी से पूछे घर में तो उन्हें नाम भी नहीं मालूम था कि कौन थे। चाची (शंभू महाराज की पत्नी) से आप पूछे महाराज बिन्दादीन के बाद पहले और कौन थे तो उनको नहीं मालूम। तुमरियाँ भी मैंने उनसे सीखीं। मेरी वाकई में गुरुवाइन थी; वो माँ तो थीं ही। गुरुवाइन भी। और जब भी मैं नाचता था तो सबसे बड़ा एक्जामिनर या जज अम्मा को समझता था। जब भी वो नाच देखती थीं तो मैं कहता था उनसे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ। मतलब बाबूजी वाला ढंग है ना कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कही नहीं बेटा नहीं। उन्हीं की तस्वीर हो। पर बैले वैले यह तो मेरा भैया क्रियेशन है। वो हरदम ऐसे ही कहती रहीं और लखनऊ के जो बुजुर्ग थे उनसे भी, गवाही ली मैंने। चेंज तो नहीं लग रहा है। नहीं बेटा वही ढंग है। और तुम्हारा शरीर वगैरह टोटल ढंग वैसा ही है। बैठने का, उठने का, बात करने का। मतलब जैसा था उनका।

 

प्रश्न

(क) बिरजू को आगे बढ़ाने में किनका हाथ है?

(ख) बिरजू ने अपनी माँ को गुरुवाइन क्यों कहा है ?

(ग) नृत्य करते समय बिरजू अपना जज किसे मानते थे? और क्यों ?

(घ) बिरजू को गवाही लेने के लिए क्या करना पड़ता था ?

उत्तर:-
(क) बिरजू को आगे बढ़ाने में उनकी मां का हाथ है।

(ख) बिरजू की माँ अक्सर पूर्वजों का गुणगान कर उनमें हौसला भरा करती थीं। किसी का नाम पूछने पर झट से बता देती थीं। नृत्य में, गलत होने पर समझा देती थीं। अपनी माँ को गुरुवाइन कहा है।

(ग) जज का काम न्याय करना होता है। न्याय के मंच पर बैठा हुआ व्यक्ति अपना-पराया नहीं देखता है। बिरजूजी की मां नृत्य करते समय अच्छे-बुरे की ताकीद किया करती थीं। अच्छा होने पर ही वह अच्छा कहती थीं।

(घ.) नृत्य अच्छा हुआ या नहीं इसके लिए बिरजू महाराज अपनी माँ को नियुक्त करते थे। गायन और नृत्य में कहीं अन्तर तो नहीं हुआ इसके लिए माँ से पूर्वजों का उदाहरण लिया करते थे। इतना ही नहीं लखनऊवासियों से भी हामी भरवाते थे।

 

5. रामपुर नवाब के महल में भी नाचा हूँ नेपाल महाराज के यहाँ भी नाचा हूँ और जमींदारों के यहाँ भी नाचा हूँ जहाँ का मैं अक्सर तमाशा सुनाता रहता हूँ कि जहाँ महफिल भी लगी है कि लड़का नाचेगा जरा चारों तरफ थोड़ा खिसककर जगह बनाओ तो सब खिसक जायें तो नीचे गलीचा गलीचे पर चांदनी और चाँदनी गलीचे के नीचे जमीन पर कहीं पर गड्ढे हैं कहीं पर खाँचा है मतलब यह सब नहीं कौन परवाह करे। आजकल हमारे नये डांसर हैं कि स्टेज बड़ा खराब है बड़ा टेढ़ा है बड़ा गड्ढा है। हम लोगों को यह सब सोचने का कहाँ मौका मिलता था। अब गर्मी के दिनों में जरा सोचो न एयरकंडीशन; न कुछ वो बड़े-बड़े पंखे लेकर जो नौकर-चाकर थे, वो हाँकते रहते थे। उनसे भी हाथ बचाना पड़ता था। नाचने में उससे न लड़ जायें कहीं। दूसरे कि गैस लाइट जल रही है उसकी भी गर्मी।

 

प्रश्न

(क) बिरजूजी का नृत्य कहाँ-कहाँ हुआ है ?

(ख) उस समय स्टेज की व्यवस्था कैसे होती थी?

(ग) पहले और आज के नर्तकों में क्या अन्तर है ?

(घ) सफल नर्तक की क्या पहचान है?

उत्तर:-
(क) बिरजूजी का नृत्य रामपुर नवाब के महल में, नेपाल महाराज के भवन में, अनेक जमींदारों आदि के यहाँ हुआ है।

(ख) उस समय स्टेज की व्यवस्था अजीबोगरीब होती थी। न समुचित रोशनी की व्यवस्था होती और न ही समतल फर्श आदि की होती थी। नृत्य हो इसके लिए साधारण रूप से व्यवस्था कर दी जाती थी।

(ग) पहले के नर्तक अपनी कला को प्रदर्शन करना जानते थे। उन्हें वाद्य-संयंत्रों, बिजली आदि की व्यवस्था से उतना संबंध नहीं रहता था। जो था उसी पर वे अपनी कला प्रदर्शित कर देते थे। आज के नर्तक कला, प्रदर्शन नहीं बाह्य आडंबर प्रदर्शित करते हैं। आज के लिए उन्हें चकाचौंध स्टेज, परिपूर्ण वाद्य-यंत्र चाहिए।

(घ) सफल नर्तक रंगमंच से प्रभावित नहीं होता है। बल्कि अपनी कला का आत्मसात करना * चाहता है। कला प्रदर्शन की क्षमता ही सफल नर्तक की पहचान है।

 

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें

प्रश्न 1. बिरजू महाराज की ख्याति किस रूप में है ?

(क) शहनाईवादक

(ख) नर्तक

(ग) तबलावादक

(घ) संगीतकार

उत्तर:- (ख) नर्तक

 

प्रश्न 2. बिरजू महाराज किस शैली के नर्तक हैं?

(क) कथक

(ख) मणिपुरी

(ग) कुचिपुडी

(घ) कारबा

उत्तर:- (क) कथक

 

प्रश्न 3. बिरजू महाराज का संबंध किस घराने से है ?

(क) लखनऊ

(ख) डुमराँव

(ग) बनारस

(घ) किसी भी नहीं।

उत्तर:- (क) लखनऊ

 

प्रश्न 4.जित-जित मैं निरखत हूँ-पाठ का संबंध किससे है ?

(क) शंभु महाराज

(ख) लच्छू महाराज

(ग) बिरजू महाराज

(घ) किशन महाराज

उत्तर:- (ग) बिरजू महाराज

 

प्रश्न 5. बिरजू महाराज को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड किस उम्र में मिला?

(क) 37 वर्ष

(ख) 27 वर्ष

(ग) 47 वर्ष

(घ) 57 वर्ष

उत्तर:- (ख) 27 वर्ष

 

प्रश्न 6.जित-जित मैं निरखत हूँ पाठ साहित्य की कौन-सी विधा है ?

(क) ललित निबंध

(ख) कहानी

(ग) कविता

(घ) साक्षात्कार

उत्तर:- (घ) साक्षात्कार

 

II. रिक्त स्थानों की पर्ति

प्रश्न 1. बिरजू महाराज कथन के लालित्य के …… हैं।

उत्तर:- कवि

 

प्रश्न 2. रश्मि वाजपेयी ……… पत्रिका की संपादिका है।

उत्तर:-नटरंग

 

प्रश्न 3. बिरजू महाराज का जन्म ……….. 1938 ई. को हुआ।

उत्तर:- 4 फरवरी

 

प्रश्न 4. शागिर्द मैं …………. का हूँ।

उत्तर:- बाबूजी

 

प्रश्न 5. …………. भी मैंने उनसे सीखी।

उत्तर:- ठुमरियाँ

 

प्रश्न 6. वैसे-वैसे मेरा …………… है।

उत्तर:- क्रियेशन

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. लच्छु महाराज कैसे आदमी थे ?

उत्तर:- लच्छु महाराज शौकीन आदमी थे और अप-टू-डेट रहते थे।

 

प्रश्न 2. बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु कब और कैसे हुई?

उत्तर:- बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु 54 वर्ष की उम्र में लू लगने से हुई।

 

प्रश्न 3. बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे?

उत्तर:- बिरजू महाराज सितार, गिटार, बाँसुरी, हारमोनियम के अलावा तबला शौक के तौर पर बजाते थे।

 

प्रश्न 4. बिरजू महाराज का जन्म कहाँ और कब हआ था?

उत्तर:- बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी 1938 ई में लखनऊ के जफरीन अस्पताल में हुआ था।

 

प्रश्न 5. बिरजू महाराज किस घराने के कलाकार थे?

उत्तर:- बिरजू महाराज लखनऊ घराने के वंशज और उसकी सातवीं पीढ़ी के कलाकार थे।

 

प्रश्न 6. बिरजू महाराज नृत्य की किस शैली के महान नर्तक थे ?

उत्तर:- बिरजू महाराज कत्थक नृत्य में पारंगत एक महान नर्तक थे।

 

प्रश्न 7. बिरजू महाराज को नृत्य का प्रशिक्षण सर्वप्रथम किससे प्राप्त हुआ?

उत्तर:- बिरजू महाराज के प्रारम्भिक गुरु उनके पिताजी थे और उन्हें सर्वप्रथम प्रशिक्षण उनसे ही प्राप्त हुआ।

 

प्रश्न 8. बिरजू महाराज ने सर्वप्रथम नृत्य का प्रदर्शन कब प्रारम्भ किया ?

उत्तर:- मात्र छः साल की उम्र में रामपुर के नवाब साहब की हवेली में उन्होंने नृत्य करना प्रारम्भ किया।

 

प्रश्न 9. निर्मला जी कौन थीं तथा बिरजू महाराज का उनसे किस प्रकार का संबंध था अथवा किस प्रकार जुड़े ?

उत्तर:- निर्मला (जोशी) दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक नामक संस्था चलाती थीं, जहाँ बिरजू महाराज ने लगभग तीन वर्षों तक कार्य किया।

 

प्रश्न 10. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है ?

उत्तर:- बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ में हुआ था। रामपुर में महाराज जी का अत्यधिक समय व्यतीत हुआ था एवं वहाँ विकास का सुअवसर मिला था।

 

प्रश्न 11. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके संपर्क में आए?

उत्तर:- नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज जी दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक से जुड़े और वहां निर्मला जी जोशी के संपर्क में आए।

 

प्रश्न 12. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला?

उत्तर:- शम्भू महाराज चाचाजी एवं बाबूजी के साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला।

 

जित-जित मैं निरखत हूँ - पाठ का सारांश

 

जन्म मेरो लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे : घर में आखिरी सन्तान। तीन बहनों के बाद। छह साल थी उम्र में मैं नवाब साहब को बहुत पसंद आ गया। मैं नवाब साहब के पास जाकर नाचता था।

 

वहाँ से फिर निर्मला जी के स्कूल में यहाँ दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक में चले गए। यहाँ दो तीन साल काम करते रहे। ये शायद 43 की बात रही होगी।

 

जहाँ वे खुद नाचते तो पहले मुझे नचवाते थे और खूब जोरों से जमकर नाचता था। प्रायवेट प्रोग्राम जिनमें बाबू जी जाते थे जौनपुर, मैनपुरी, कानपुर, देहरादून, कलकत्ता, बंबई आदि, इनमें मुझे जरूर रखते थे। पहले इसीलिए कलकत्ते में बहुत मजा आया। उसमें फर्स्ट प्राइज मिलने वाला था। उसमें शम्भू महाराज चाचाजी और बाबू जी दोनों नाचे। पर उसमें फर्स्ट प्राइज मुझे मिला।

 

हाँ साढ़े नौ साल की उम्र में बाबू जी मृत्यु हो गई। मुझे तालीम बाबूजी से ही मिला। 500 रुपए देकर मैंने गण्डा बंधवाया। तो शागिर्द मैं बाबू जी का हूँ। उनके मरते ही हम लोगों के बहुत खराब दिन शुरू हो गए। कानपुर में दो ढाई साल रहा। आर्यानगर में 25-25 रुपए की दो ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। 50 रुपए में काम कर किसी तरह पढ़ता रहा मैं। पिताजी की मृत्यु के समय उनके श्राद्ध कर्म करने के लिए पैसे नहीं। दस दिन के अंदर मैंने दो प्रोग्राम किए। 500 रु. इकट्ठे हुए तो दसवाँ और तेरहवीं की गई।

 

चौदह साल का था तो संगीत भारती आया। मैंने यहाँ साढ़े चार साल काम किया। संगीत भारती की कमाई से मैंने एक साइकिल खरीदी थी जो मेरे पास आज भी है। और उस साइकिल को मैं नहीं बेचता।

 

खैर उसमें से रश्मि जी एक लड़की मिली थी। उन्हें पूरे मन से सिखाया। वो तालीम देखकर जो महाराज के यहाँ की लड़कियाँ अट्रेक्ट हुई। क्योंकि तालीम जरा अच्छी थी मेरी। संगीत भारती के जमाने में कलकत्ते में एक कांफ्रेंस में नाचा हूँ। कलकत्ते की ऑडियन्स ने मेरी बड़ी प्रशंसा की। इतनी की कि तमाम अखबारों में मैं छप गया एकदम। उसके बाद हरिदास स्वामी कांफ्रेंस बंबई ब्रजनारायण ने बुलाया। मेरा प्रोग्राम बहुत अच्छा हुआ। उसके बाद से बम्बई, कलकत्ते, मद्रास आदि जगहों पर मेरा प्रोग्राम होने लगा। विदेश दूर में सबसे पहले रूस गये। उसके बाद जर्मनी, जापान, हांगकांग, लाओस, बर्मा आदि।

 

अम्मा को मैं सबसे बड़ा जज मानता हूँ। जब वो नाच देखती तो मैं पूछता था कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ। मतलब बाबूजी वाला ढंग है ना कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कहती नहीं बेटा नहीं। उन्हीं की तस्वीर हो।

 

शब्दार्थ

क्रोड़स्थ : गोद या अंक में स्थित

हलकार : संदेशवाहक, कारिंदा

साफा : साफ लंबा वस्त्र जिसे नर्तक कंधे से लेकर कमर तक लपेट लेता है

अचकन : पोशाक विशेष

मेजरमेंट : नाप, माप नाप, माप

मस्का : मक्खन (मस्का लगाना या मक्खन लगाना मुहावरा भी है)

परन : तबले के वे बोल जिन पर नर्तक नाचता और ताल देता है

बंदिश : ठुमरी या अन्य प्रकार के गायन के बोल, स्थायी

दाल का चिल्ला : उबले हुए दाल को मसलकर बनाया गया व्यंजन

गण्डा बांधना : दीक्षित करना, शिष्य स्वीकार करना

नजराना : भेंट, उपहार, गुरुदक्षिणा

नागा : अनुपस्थित, हाजिर नहीं होना, गायब रहना

गिरहकट : पैंतरेबाज, गाँठ काट लेनेवाला, पाकेटमार विशेष

परमानेंट : स्थायी

चरण : छंद की एक इकाई

टुकड़े : किसी पद की पंक्ति

तिहाइयाँ : तीसरे हिस्से

बैले : यूरोपीय नृत्य विशेष जिसमें कथानक, भावाभिनय और नृत्य तीनों शामिल

होते हैं

अरसा : समय, अवधि

गलीचा : फर्श या बिस्तर जो नरम हो

मिजराब : सितार बजाने का एक तरह का छल्ला

लहरा : छंदमय आरोही गति जो भावप्रसंग के साथ हो ।

शागिर्द : शिष्य

लाजवाब : जिसका जवाब न हो, अद्वितीय, अनुपम

The   End 

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