Page 591 Class 10 Hindi काव्य खण्ड पाठ 4 स्वदेशी

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गद्य खण्ड / काव्य खण्ड   

पाठ 4 स्वदेशी
(
प्रेमघन)

प्रश्न 1. कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- वस्तुत: किसी भी गद्य या पद्य का शीर्षक वह धुरी होता है जिसके चारों तरफ कहानी या भाव घूमते रहता है। रचनाकार शीर्षक देते समय उसके कथानक, कथावस्तु, कथ्य को ध्यान में रखकर ही देता है। प्रस्तुत कविता का शीर्षक स्वदेशी अपने आप में उपयुक्त है। पराधीन भारत की दुर्दशा और लोगों की सोच को ध्यान में रखकर इस शीर्षक को रखा गया है। अंग्रेजी वस्तुओं को फैशन मानकर नये समाज की परिकल्पना करते हैं।

 

रहन-सहन खान-पान आदि सभी पाश्चात्य देशों का ही अनुकरण कर रहे हैं। स्वदेशी वस्तुओं को तुच्छ मानते हैं। हिन्दु, मुस्लमान, ईसाई आदि सभी विदेशी वस्तुओं पर ही भरोसा रखते हैं। उन्हें अपनी संस्कृति विरोधाभास लाती है। बाजार में विदेशी वस्तुएँ ही नजर आती है। भारतीय कहने-कहलाने पर अपने आप को हेय की दृष्टि से देखते हैं। सर्वत्र पाश्चात्य चीजों का ही बोल-बाला है। अतः इन दृष्टान्तों से स्पष्ट होता है। प्रस्तुत कविता का शीर्षक सार्थक और समीचीन है।

 

प्रश्न 2. कवि को भारत में भारतीयता क्यों नहीं दिखाई पड़ती?

उत्तर:- किसी देश के प्रति वहाँ के जनता की कितनी निष्ठा है, देशवासी को अपने देश की संस्कृति में कितनी आस्था है यह उसके रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान से पता चलता है। कवि को भारत में स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि यहाँ के लोग विदेशी रंग में रंगे हैं। खान-पान, बोल-चाल, हाट-बाजार अर्थात् सम्पूर्ण मानवीय क्रिया-कलाप में अंग्रेजीयत ही अंग्रेजीयत है। पाश्चात्य सभ्यता का बोल-बाला है। भारत का पहनावा, रहन-सहन, खान-पान कहीं दिखाई नहीं देता है। हिन्दू हों या मुसलमान, ग्रामीण हो या शहरी, व्यापार हो या राजनीति चतुर्दिक अंग्रेजीयत की जय-जयकार है। भारतीय भाषा, संस्कृति, सभ्यता धूमिल हो गई है। अतः कवि कहते हैं कि भारत में भारतीयता दिखाई नहीं पड़ती है।

 

प्रश्न 3. कवि समाज के किए वर्ग की आलोचना करता है और क्यों?

उत्तर:- उत्तर भारत में एक ऐसा समाज स्थापित हो गया है जो अंग्रेजी बोलने में शान की बात समझता है। अंग्रेजी रहन-सहन, विदेशी ठाट-बाट, विदेशी बोलचाल को अपनाना विकास मानते हैं। हिन्दुस्तान की नाम लेने में संकोच करते हैं। हिन्दुस्तानी कहलाना हीनता की बात समझते ।। हैं। झूठी प्रशंसा करते हुए फूले नहीं समाते। अपनी मूल संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर गौरवान्वित होना अपने देश में प्रचलित हो गया है। ऐसी प्रचलन को बढ़ावा देने वाले वर्ग की कवि आलोचना करते हैं क्योंकि यह देशहित की बात नहीं है। ऐसा वर्ग देश को पुनः अपरोक्ष रूप से विदेशी-दासता के बंधन में बाँधने को तत्पर हो रहा है।

 

प्रश्न 4. कवि नगर, बाजार ओर अर्थव्यवस्था पर क्या टिप्पणी करता है?

उत्तर:- कवि के अनुसार आज नगर में स्वदेशी की झलक बिल्कुल नहीं दिखती। नगरीय व्यवस्था, नगर का रहन-सहन सब पाश्चात्य सभ्यता का अनुगामी हो गया है। बाजार में वस्तुएँ विदेशी दिखती हैं। विदेशी वस्तुओं को लोग चाहकर खरीदते हैं। इससे विदेशी कंपनियाँ लाभान्वित हो रही हैं। स्वदेशी वस्तुओं का बाजार-मूल्य कम हो गया है। ऐसी प्रथा से देश की आर्थिक स्थिति पर कुप्रभाव पड़ रहा है। चतुर्दिक विदेशीपन का होना हमारी कमजोरी उजागर कर रही है।

 

प्रश्न 5. नेताओं के बारे में कवि की क्या राय है ?

उत्तर:- आज देश के नेता, देश के मार्गदर्शक भी स्वदेशी वेश-भूषा, बोल-चाल से परहेज करने लगे हैं। अपने देश की सभ्यता संस्कृति को बढ़ावा देने के बजाय पाश्चात्य सभ्यता से स्वयं प्रभावित दिखते हैं। कवि कहते हैं कि जिनसे धोती नहीं सँभलती अर्थात् अपने देश के वेश-भूषा को धारण करने में संकोच करते हों वे देश की व्यवस्था देखने में कितना सक्षम होंगे यह संदेह का विषय हो जाता है। जिस नेता में स्वदेशी भावना रची-बसी नहीं है, अपने देश की मिट्टी से दूर होते जा रहे हैं, उनसे देश सेवा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। ऐसे नेताओं से देशहित की अपेक्षा करना ख्याली-पुलाव है।

 

प्रश्न 6. कवि ने डेफाली किसे कहा है और क्यों?

उत्तर:- जिन लोगों में दास-वृत्ति बढ़ रही है, जो लोग पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति की दासता के बंधन में बंधकर विदेशी रीति-रिवाज का बने हुए हैं उनको कवि डफाली की संज्ञा देते हैं क्योंकि व विदेश की पाश्चात्य संस्कृति की, विदेशी वस्तुओं की, अंग्रेजी की झूठी प्रशंसा में लगे हुए हैं। डफाली की तरह राग-अलाप रहे हैं, पाश्चात्य की, विदेशी एवं अंग्रेजी की गाथा गा रहे हैं।

 

प्रश्न 7. व्याख्या करें

(क) मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।

(ख) अंग्रेजी रूचि, गृह, सकल वस्तु देस विपरीत।

उत्तर:-
(क) प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य की पाठ्य-पुस्तक के स्वदेशी शीर्षक पद से उद्धत है। इसकी रचना देशभक्त कति बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन द्वारा की गई है। इसमें कवि ने देश-प्रेम की भाव को जगाने का प्रयास किया है। कवि ने स्वदेशी भावना को जगाने की आवश्यकता पर बल दिया है। पाश्चात्य रंग में रंग जाना कवि के विचार से दासता की निशानी है।

 

प्रस्तुत व्याख्येय में कवि ने कहा है कि आज भारतीय लोग अर्थात् भारत में निवास करने वाले मनुष्य इस तरह से अंग्रेजीयत को अपना लिये हैं कि वे पहचान में ही नहीं आते कि भारतीय हैं। आज भारतीय वेश-भूषा, भाषा-शैली, खान-पान सब त्याग दिया गया है और विदेशी संस्कृति को सहजता से अपना लिया गया है। मुसलमान, हिन्दु सभी अपना भारतीय पहचान छोड़कर अंग्रेजी की अहमियत देने लगे हैं। पाश्चात्य का अनुकरण करने में लोग गौरवान्वित हो रहे हैं।

 

(ख) प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य की पाठ्य पुस्तक के कवि प्रेमघन जी द्वारा रचित स्वदेशी पाठ से उद्धत है। इसमें कवि ने कहा है कि भारत के लोगों से स्वदेशी भावना लुप्त हो गई है। विदेशी भाषा, रीति-रिवाज से इतना स्नेह हो गया है कि भारतीय लोगों का रुझान स्वदेशी के प्रति बिल्कुल नहीं है। सभी ओर मात्र अंग्रेजी का बोलबाला है।

 

प्रश्न 8. आपके मत से स्वदेशी की भावना किस दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है ? स्पष्ट करें।

उत्तर:- मेरे विचार से दोहे संख्या 9 (नौ) में स्वदेशी की भावना सबसे अधिक प्रभावशाली है। स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति सभ्यता में जितनी अधिक सरलता, स्वाभाविकता एवं पवित्रता है उतनी विदेशी संस्कृति सभ्यता में नहीं है। आज ऐसा समय आ गया है कि यहाँ के लोगों से जब पवित्र भारतीय संस्कृति का प्रबंधन कार्य ही नहीं संभल रहा है तो जटिलता से भरी हुई विदेशी संस्कृति का निर्वाह कहाँ तक कर सकेंगे। अतः हर स्थिति में पूर्ण बौधिकता का परिचय देते हुए भारतीय संस्कृति, मूल वंश-भूषा का निर्वहन किया जाना चाहिए।

 

प्रश्न 9. स्वदेशी कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर:- प्रेमधन सर्वस्व से संकलित प्रस्तुत दोहा में प्रेमघन ने देश-दशा का उल्लेख करते हुए नव जागरण का शंख फूंका है। वे कहते हैं-

देश के सभी लोगों में विदेशी रीति, स्वभाव और लगाव दिखाई पड़ रहा है। भारतीयता तो अब भारत में दिखाई ही नहीं पड़ती। आज भारत के लोगों को देखकर पहचान करना कठिन है कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान और कौन ईसाई।

 

विदेशी भाषा पढ़कर लोगों की बुद्धि विदेशी हो गई है। अब इन लोगों को विदेशी चाल-चलन भाने लगी है। लोग विदेशी ठाट-बाट से रहने लगे हैं अपना देश विदेश बन गया है। कहीं भी नाममात्र को भारतीयता दृष्टिगोचर नहीं होती।

 

अब तो हिन्दू लोग हिन्दी नहीं बोलते। वे अंग्रेजी का ही प्रयोग करते हैं, अंग्रेजी में ही भाषण देते हैं। वे अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करतं, अंग्रेजी कपड़े पहनते हैं। उनकी रीति और नीति भी अंग्रेजी जैसी है। घर और सारी चीजें देशी नहीं हैं। ये देश के विपरीत हैं।

 

सम्प्रति, हिन्दुस्तानी नाम से भी ये शर्मिंदा होते और सकुचाने लगते हैं। इन्हें हर भारतीय वस्तु से घृणा है। इनके उदाहरण हैं देश के नगर। सर्वत्र अंग्रेजी चाल-चलन है। बाजारों में देखिए अंग्रेजी माल भरा है।

 

देखिए, जो लोग अपनी ढीली-ढाली धोती नहीं सँभाल सकते, वे लोग देश को क्या सँभालेंगे? यह सोचना ही कल्पनालोक में विचरण करना है। चारों ओर चाकरी की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ये लोग झूठी प्रशंसा, खुशामद कर डफली अर्थात् ढिंढोर भी बन गए हैं।

 

प्रश्न 10.स्वदेशी के दोहे राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हैं। कैसे ? स्पष्ट कीजिये।

उत्तर:- बदरी नारायण चौधरी प्रेमघन कृत स्वदेशी के दोहे राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीयता के शनैः-शनैः होते विलोपन से व्याकुल मन के चीत्कार हैं। पराधीन काल में जब लोगों की वेश-भूषा, चाल-ढाल, को अंग्रेजीयत के रंग में रंगता दिखलाई पड़ता है तो उसे पीड़ा होती है। अब तो भारतीयों की पहचान मुश्किल हो रही है-मनुज भारतीय कोऊ सकत नहीं पहिचान, मुसलमान, हिन्दू किंधौं, के ये हैं ये क्रिस्ताना

कवि यह देख भी दुखी होता है कि विदेशी विद्या ने देश के लोगों की सोच ही बदल दी है-

 

पढ़ि विद्या परदेश की बुद्धि विदेशी पाया

चाल चलन परदेस की, गई इन्हें अति भाय।।

 

लोगों में तो लगता है कि भारतीयता लेशमात्र को नहीं बची। लोग अंग्रेजी बोल रहे हैं, अंग्रेजी ढंग से रह रहे हैं। हिन्दुस्तानी नाम से ही लज्जा महसूस करते हैं और भारतीय वस्तुओं से घृणा करते हैं

 

हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचित लजात।

भारतीय सब वस्तु ही, सों ये हाथ घिनात।

 

कवि की राष्ट्रीय भावना पर कहर चोट तब पड़ती है जब सभी वर्ग के लेकर आत्म-सम्मान छोड़कर चाकरी के लिए ललायित हो रहे हैं, अंग्रेज हाकिमों की इन प्रशंसा कर रहे हैं। सबसे बड़ी हताशा उसे अपने नेताओं की हालत पर हो रही है वे देश के नहीं, अपने कल्याण में लगे

हैं। स्वार्थपरता ने उन्हें इतना घेर लिया कि उनकी संतानों ही हाथ से निकल रही है। जब ये अपना घर ही नहीं सँभाल सकते तो देश क्या सँभालेंगे-

 

जिनसों सम्हल सकत नहिं तनकी धोती ढीली ढाली।

देस प्रबंध करिहिंगे यह, कैसी खाम ख्याली।

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वदेशी के दोहों में देश की दशा के वक्त के माध्यम से कवि ने लोगों में राष्ट्रीय भावना भरने की चेष्टा की है। अतएव, दोहे निश्चित तौर पर राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हैं। इनसे राष्ट्रभक्ति को प्रेरक मिलती है।

 

भाषा की बात

 

प्रश्न 1.

निम्नांकित शब्दों से विशेषण बनाएँ-

रूचि, देस, नगर, प्रबंध, ख्याल, दासता, झूठ, प्रशंसा।

उत्तर:-
रूचि
रूच

देरू देसी

नगर नागरिक

प्रबंध प्रबंधित

ख्याल ख्याली

दारूता दारू

झूठ झठा

 

प्रश्न 2. निम्नांकित शब्दों का लिंग-निर्णय करते हुए वाक्य बनाएँ

चाल-चलना; खामख्याली, खुशामद, माल, वस्तु, वाहन, रीत, हाट, दारूवृति, बानका

उत्तर:-
चाल-चलन
उसकी चाल-चलन ठीक नहीं है।

खामख्याली खामख्याली, झूठी होती है।

खुशामद खुशामद अच्छी चीज नहीं है।

माल माल छूट गया।

वस्तु वस्तु अच्छी है। वाहन

वाहन वाहन नया है।

रीत रीत उसकी रीत नई है।

हाट शाम का हाट लग गया।

दारूवृति उसकी दासवृत्ति अच्छी है।

बानक उका बानक अच्छा है।

 

प्रश्न 3. कविता से संज्ञा पदों का चुनाव करें और उनके प्रकार भी बताएं।

उत्तर:-
वस्तु
जातिवाचक

नर जातिवाचक

भारतीयता भाववाचक

भारत व्यक्तिवाचक संज्ञा

मनुज जातिवाचक संज्ञा

भारती व्यक्तिवाचक

चाल-चलन भाववाचक

देश जातिवाचक

विदेश जातिवाचक

बरून जातिवाचक

गृह जातिवाचक

हिन्दुस्तानी जातिवाचक

नगर जातिवाचक

हाटन जातिवाचक

धोनी जातिवाचक

खुशामद भाववाचक

 

काव्यांशों पर आधारित अर्थ-ग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

 

सवै बिदेसी वस्तु नर, गति रति रीत लखात।

भारतीयता कछु न अब, भारत म दरसात।।

मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।

मुसलमान, हिंदू किधौं, के हैं ये क्रिस्तान।

पढ़ि विद्या परदेस की, बुद्धि विदेसी पाय।

चाल-चलन परदेस की, गई इन्हें अति भाय।।

 

प्रश्न

(क) कवि एवं कविता का नाम लिखिए।

(ख) पद का प्रसंग लिखें।

(ग) पद का सरलार्थ लिखें।

(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।

(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।

उत्तर:-
(क) कवि-बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन कविता- स्वदेशी।

(ख)प्रस्तुत दोहे में कवि भारत से भारतीयता का लोप होने की बात कहता है। वे आज के यथार्थ को उजागर करने का पूर्ण प्रयास किये हैं। वर्तमान समय में विदेशी विधा, रहन-सहन, चाल-चलन सब भारतीय लोगों पर हावी है। लोग विदेशी रंग में रंगकर अपनी असलियत भूल गये हैं। इन्हीं तथ्यों को इन दोहों के माध्यम से कवि उजागर करने का प्रयास करते हैं।

 

(ग) सरलाई कवि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की धूमिलता पर आक्षेपित स्वर में कहते हैं कि सभी जगह से भारतीयता समाप्त हो गई है। यहाँ के लोग विदेशी वस्तुओं पर रीझे हुए हैं। यहाँ तक कि विदेशी संस्कृति सभ्यता अपनाकर स्वदेशी संस्कृति सभ्यता को धूमिल कर दिये हैं। सभी जगह विदेशी स्वभाव, लगाव एवं नियम देखने को मिल रहे हैं। भारतीयता कुछ नहीं है, जो भारत में दर्शन हो। यहाँ तक कि यहाँ के लोग अपनी संस्कृति को देखकर भी पहचान नहीं रहे हैं। यहाँ के मुसलमान और हिन्दू किधर गए हैं। इसकी तो बात ही नहीं है। जैसे लगता है कि संपूर्ण देश अंग्रेजीमय हो गया है। विदेशी विद्या पढ़ कर बुद्धि भी विदेशी पा गये हैं। यहाँ तक की विदेशी चाल-चलन यहाँ के लोगों को बहुत आकर्षित कर रही है।

 

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत कविता में भारतीय सभ्यता और संस्कृति की वर्तमान स्थिति कितनी बदतर हो गई है यह जग-जाहिर है। स्वदेशी वस्तु को अपनाना घृणा की बात और विदेशी वस्तु को अपनाना गर्व की बात समझ रहे है। हिन्दू और मुसलमान सभी अंग्रेजीमय वातावरण

को स्वीकार कर लिये हैं।

 

(ङ) काव्य-सौंदर्य-

 

प्रस्तुत कविता स्वदेशी में हिन्दी खड़ी बोली का व्यवहार स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

यहाँ खड़ी बोली के साथ-साथ ब्रजभाषा की पुट एवं तत्सम्-तद्भव की झलक भाव की कोमलता में सहायक हुए हैं।

भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग सार्थक बन पड़ा है।

दोहे छंद के सभी लक्षण यहाँ उपस्थित हैं।

अलंकार की दृष्टि से अनुप्रास की प्राथमिकता देखी जा रही है। कहीं-कहीं पुनरुक्ति प्रकाश का अंश है।

2. ठटे बिदेसी ठाट सब, बन्यो देस बिदेस।

सपनेहूं जिनमें न कहुँ, भारतीयता लेस।।

बोलि सकत हिंदी नहीं, अब मिलित हिंदू लोग।

अंगरेजी भाखन करत, अंगरेजी उपभोग।

अंगरेजी बाहन, बसन, वेष रीति और नीति।

अंगरेजी रुचि, गृह, सकल, बस्तु देस विपरीत॥

 

प्रश्न

(क) कवि तथा कविता का नाम लिखें।

(ख) पद का प्रसंग लिखें। ।

(ग) सरलार्थ लिखें।

(घ) भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।

(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।

उत्तर:-
(क)कविता- स्वदेशी।

कवि बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन

 

(ख) प्रसंग-प्रस्तुत कविता में देश भक्ति की भावना ओत-प्रोत है। भारत में विदेशी सभ्यता और संस्कृति का जो पदार्पण हो गया है उसी पर कवि यथार्थ शैली में लिखकर लोगों को नव-जागरण की ओर ले जाना चाहते हैं।

 

गोमालाई प्रस्तुत कविता में कवि कहते हैं कि सभी जगह हमारे देश में विदेशी ठाट-बाट ही देखने को मिल रहे हैं। लगता है कि स्वप्न में भी लेश मात्र भारतीय सभ्यता नहीं है। यहाँ के हिंदू लोग भी हिन्दी बोलने में असमर्थ हो रहे हैं। हिन्दी बोलने में उन्हें तौहिनी महसूस होती है। अंग्रेजी बोलकर गौरवान्वित होते हैं और अंग्रेजी वस्तु का उपभोग करना प्रसन्नता की बात समझते हैं।

अंग्रेजी वाहन, वस्त्र, वेश-भूषा, नियम और नीति, रुचि और अभिलाषा, घर और वस्तु सभी अपनाकर अपने देश के विपरीत कार्य कर रहे हैं।

 

(घ) भाव-सौंदर्य प्रस्तुत अंश में विदेशी ठाट-बाट पर कटाक्ष करते हुए भारतीयता पर सवाल उठाया गया है। कवि की दृष्टि में आज भारत की सम्पूर्ण भारतीयता विदेशी संस्कृति सभ्यता में समाहृत हो गई है। यहाँ की रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा ये सभी अंग्रेजीमय हो गये हैं।

(क) काव्य-मोदर्य

 

सम्पूर्ण कविता दोहे छंद में लिखी हुई है।

दोहे का सम्पूर्ण लक्षण उपस्थित होने के कारण कविता गेय हो गई है। खड़ी बोली के साथ-साथ ब्रजभाषा की प्राथमिकता है।

अलंकार की दृष्टि से अनुप्रास की प्राथमिकता है। प्रसाद गुण अपने पूर्ण वातावरण में उपस्थित है।

3. हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचि लजाता

भारतीय सब वस्तु ही, सों ये हाय धिनात॥

देस नगर बानक बनो, सब अंगरेजी चाल।

हाटन मैं देखहु भरा, बसे अंगरेजी माल।।

जिनसों सम्हल सकत नहिं तनकी, धोती ढीली-ढाली।

देस प्रबंध करिहिंगे वे यह, कैसी खाम खयाली॥

दास-वृत्ति की चाह चहूँ दिसि चारह बरन बढ़ाली।

करत खुशामद झूठ प्रशंसा मानहुँ बने डफाली।

 

प्रश

(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।

(ख) पद का प्रसंग लिखिए।

(ग) सरलार्थ लिखिए।

(घ) भव-सौंदर्य स्पष्ट करें।

(ङ) काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें।

उत्तर:-
(क)कविता-स्वदेशी।

कवि-बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन।

(ख) प्रसंग-प्रस्तुत कविता देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण है। इन दोहों में राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतनो को सहचर बनाया गया है। साथ ही नव-जागरण का स्वर मुखरित किया गया है। विदेशी वस्तु का भारत में स्वीकार एवं स्वदेशी वस्तु के तिरस्कार पर यथार्थ चित्रण किया गया है।

 

(ग) सरलार्थ-कवि कहते हैं कि भारत के लोग हिन्दुस्तानी शब्द से अपने आपको सम्बोधित करते हुए भी संकोच करते हैं। सभी भारतीय वस्तुओं का प्रयोग करते हुए घृणा करते हैं।

 

देश, नगर सभी जगह अंग्रेजी वेश-भूषा और चाल-ढाल देखी जा रही है। यहाँ के बाजारों में भी अंग्रेजी माल भरे पड़े है। जबकि यहाँ के लोग अपनी वेश-भूषा भी नहीं संभाल रहे हैं तो विदेशी प्रबंध को, जो पूर्ण जटिल हैं, उन्हें संभालने की यहाँ के लोग केवल कोरी कल्पना ही करते हैं। देखा जा रहा है कि यहाँ के लोगों में गुलामी के वातावरण में जीवन-यापन करने की आदत हो गई है। चारों ओर इसी का भाव मिल रहा है। खुशामद करना तथा झूठी प्रशंसा करना, झूठे राग की डफली बजाना यहाँ के लोगों की संस्कृति बन गई है।

 

(घ) भाव-सौंदर्य-कविता में पूर्ण रूप से लाक्षणिकतावादी स्वर मुखरित हुआ है। यहाँ विदेशी संस्कृति सभ्यता पर जमकर प्रहार किया गया है और विदेशी संस्कृति सभ्यता अपनाने वालों के प्रति भी कवि का एकमुख संदेश है।

 

(ङ)काव्य-सौंदर्य-

 

यहाँ दोहे छंद हैं। अलंकार का समायोजन स्पष्ट रूप में नहीं है।

देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत रहने के कारण प्रसाद गुण की प्राथमिकता है।

भाषीय व्याकरण की दृष्टि से विशेषण लिंग, संज्ञा कारक की उपस्थिति सम्यक् भाषा की अपेक्षा है। भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग पूर्ण सार्थक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. सही विकल्प चुनें-

 

प्रश्न 1.स्वदेशी किस कवि की रचना है?

(क) घनानंद

(ख) सुमित्रानंदन पंत

(ग) रामधानी सिंह दिनकर

(घ) प्रेमधन

उत्तर:- (घ) प्रेमधन

 

प्रश्न 2.प्रेमधन किसका उपनाम है?

(क) सच्चिदानंद हीरा नंद वात्स्यायन

(ख) सूर्यकान्त त्रिपाठी

(ग) बदरी नारायण चौधरी

(घ) वीरेन डंगवाल ।

उत्तर:- (ग) बदरी नारायण चौधरी

 

प्रश्न 3. प्रेमधन किस युग के कवि थे?

(क) आदिकाल

(ख) भक्तिकाल

(ग) भारतेन्दु युग

(घ) छायावादी युग

उत्तर:- (ग) भारतेन्दु युग

 

प्रश्न 4. कवि प्रेमधन के अनुसार भारत में आज कौन-सी वस्तु दिखाई नहीं पड़ती?

(क) भारतीयता

(ख) कदाचारिता

(ग) पत्रकारिता

(घ) अंग्रेजी भाषाः

उत्तर:- (क) भारतीयता

 

प्रश्न 5. आजकल भारत के लोग किस भाषा में बोलना पसन्द करते हैं ?

(क) हिन्दी

(ख) मातृभाषा

(ग) अंग्रेजी

(घ) फ्रेंच

उत्तर:- (ग) अंग्रेजी

 

प्रश्न 6. इन दिनों भारत के बाजार किन वस्तुओं से भरे पड़े हैं ?

(क) चीनी .

(ख) पाकिस्तानी

(ग) विदेशी

(घ) अफगानी

उत्तर:- (ग) विदेशी

 

प्रश्न 7. भारत के लोगों को अब क्या भाने लगा है ?

(क) विदेशी रहन-सहन

(ख) देसी घी

(ग) परदेशी

(घ) आतंक

उत्तर:- (क) विदेशी रहन-सहन

 

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

प्रश्न 1. अब ……. से भारतीयों को पहचानना कठिन है।

उत्तर:- कपड़ों

 

प्रश्न 2. हिन्दुस्तानियों को अब ………..नाम नहीं रुचते।

उत्तर:- हिन्दुस्तानी

 

प्रश्न 3.स्वदेशी कविता …………से संकलित है।

उत्तर:- प्रेमधन-सर्वस्व

 

प्रश्न 4. आजकल अधिकांश भारतीयं ………… बोलना पसंद करते हैं।

उत्तर:- अंग्रेजी

 

प्रश्न 5.भारत-सौभाग्य नाटक की रचना ………….. ने की है।

उत्तर:- प्रेमधन

 

प्रश्न 6.अब सबकी चाह …………….. की है।

उत्तर:- नौकरी

 

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.प्रेमघन के आदर्श-पुरुष कौन थे ?

उत्तर:- प्रेमघन के आदर्श-पुरूष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे।

 

प्रश्न 2.प्रेमघन का गा-लेखन कैसा था?

उत्तर:- प्रेमघन के गद्य-लेखन अत्यंत आलंकारिक थे।

 

प्रश्न 3. किन-किन पत्रिकाओं का सम्पादन प्रेमघन ने किया?

उत्तर:- कादंबिनी मासिक और नागरी नीरद साप्ताहिक का सम्पादन प्रेमघन ने किया।

 

प्रश्न 4. साहित्य-सम्मेलन के किस अधिवेशन का सभापतित्व प्रेमघन ने किया?

उत्तर:- साहित्य-सम्मेलन के कलकत्ता अधिवेशन का सभापतित्व प्रेमघन ने किया।

 

प्रश्न 5.स्वदेशी कविता में किस बात पर दुख व्यक्त किया गया है ?

उत्तर:- स्वदेशी कविता में भारत में भारतीयता की कमी पर दुख व्यक्त किया गया है।

 

व्याख्या खण्ड

 

प्रश्न 1.

सबै बिदेसी वस्तु नर, गति रति रीत लखात।

भारतीयता कछु न अब, भारत म दरसात।।

मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।

मुसलमान, हिन्दु किधौं, के हैं ये क्रिस्तान।।

व्याख्या-

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के स्वदेशीकाव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि ने गुलाम भारत की दुर्दशा का बड़ा ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। कवि कहता है कि भारतीय लोगों की सूझ-बूझ को क्या कहा जाय-सभी विदेशी आकर्षण की ओर भागे जा रहे हैं। उनका अपना स्व सुरक्षित नहीं दिखता।

 

भारतीय जन गी गति, रति, रीति सब कुछ बदल गयी है। वे सब कुछ विदेशी अपना लिये हैं। उनकी अपनी भारतीय विशेषताएँ अब नहीं दिखायी पड़तीं। भारतीयता अब भारत में नहीं रहीं न दिखायी ही पड़ रही हैं।

इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारतीयता की जगह अंग्रेजियत में रंगों सभ्यता और संस्कृति को चित्रित किया है तथा अपनी भावनाओं को अपनी कविताओं के द्वारा प्रकट कर रहा है।

 

इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारतीय लोगों की जाति धर्म के बारे में चिंता प्रकट की है। कवि कहता है कि भारतीय लोगों को देखकर पहचानना मुश्किल हो गया है। कौन हिन्दू है ? कौन मुसलमान है और कौन ईसाई है ? इन पंक्तियों में, बदलती जीवन-शैली और अपनी संस्कृति के प्रति आस्थाहीन होने पर भारतीय लोगों के बारे में कवि ने चिंता प्रकट किया है। वह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बदलते रूप को देखकर भयभीत है-आगे क्या होगा? इसी कारण उसने अपनी काव्य पंक्तियों द्वारा जाति-धर्म की परवाह नहीं करते हुए स्वच्छंद और अनुशासनहीन जीवन जीनेवालों का सही चित्र उकेरा है।

 

प्रश्न 2.

पढ़ि विद्या परदेसी की, बुद्धि विदेसी पाय।

चाल-चलन परदेसी की, गई इन्हैं अति भाय॥

ठटे बिदेसी ठाट सब बन्यो देस बिदेस।

सपनेहैं जिनमें न कहं, भारतीयता लेस॥

व्याख्या-

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के स्वदेशी काव्य पाठ से उद्धत्त की गयी हैं। इन पंक्तियों के द्वारा कवि कहना चाहता है कि भारतीय लोग विदेशी विद्या को पढ़ने की ओर उन्मुख है, विदेशी विद्या के अध्ययन के कारण इनकी बुद्धि-विचार भी विदेशी-सा हो गया है। दूसरे देश की चाल-चलन, वेश-भूषा, रीति-नीति, इन्हें बहुत अच्छी लग रही है। इनकी मति मारी गयी है।

 

कवि ने विदेशी ज्ञान प्राप्त करनेवाले भारतीय लोगों की मानसिकता का सही चित्रण किया है। कवि कहता है कि अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति इनका मोह नहीं रहा। ये अब विदेशी रहन-सहन में ढल गए हैं, यह खेद का विषय है। आधुनिकता की ओर उन्मुख भारतीय शिक्षित वर्ग की अदूरदर्शिता के प्रति कवि ने घोर निंदा प्रकट करते हुए अपनी मनोव्यथा को व्यक्त किया है।

 

इन पंक्तियों द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि अपने ही देश में सारे ठाट-बाट ने विदेशी रूप धारण कर लिया है। सभी लोग अंग्रेजियत से प्रभावित रहन-सहन, सोच-विचार में ढल गए हैं। सबकी मानसिकता विकृत हो गयी है। किसी को भी अपनी निजता, इतिहास, अस्तित्व के प्रति गर्व नहीं, सभी-लोभी और महत्त्वाकांक्षी हो गये हैं।

 

प्रश्न 3.

बोलि सकत हिन्दी नहीं, अब मिलि हिंदू लोग।

अंगरेजी भाखन करत, अंगरेजी उपभोग।।

अंगरेजी बाहन, बसन, वेष रीति औ नीति।

अँगरेजी रूचि, गृह, सकल, वस्तु देस विपरीत।

व्याख्या-

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक स्वदेशी काव्य पाठ से ली गयी हैं। इन पक्तियों के द्वारा कवि कहना चाहता है कि अब भारतीय लोगों को हिन्दी में बोलने, पढ़ने-लिखने में लज्जा का अनुभव होता है। हिन्दुओं के लिए यह अत्यन्त खेदजनक है। अंग्रेजी में ही बातचीत सभी लोग करते हैं और अंग्रेजी वस्तुओं का ही उपभोग भी करते हैं।

 

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने अंग्रेजी वाहन, वसन या वस्त्राभूषणादि के अपनाये जाने की घोर निन्दा और उसपर चिंता प्रकट किया है। हमारी अंग्रेजी के प्रति बढ़ती रुचि की ओर, गृह-साज-सज्जा की ओर, उक्त सारी वस्तुओं के प्रयोग की ओर कवि ने ध्यान आकृष्ट करते हुए दुःख प्रकट किया है। हमारी घटिया मनोवृत्ति से कवि व्यथित है। उसके भीतर कूट-कूटकर भारतीयता भरी हुई है। इसी कारण वह भारतीय जन की बदलती हुई जीवन शैली से दु:खी है।

 

प्रश्न 4.

हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचि लजात।

भारतीय सब वस्तु ही, सों ये हाय घिनात॥

देस नगर बानक बनो, सब अंगरेजी चाल।

हाटन मैं देखहु भरा, बसे अंगरेजी माल॥

व्याख्या-

प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक के स्वदेशी काव्य-पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने भारतीय जन चेतना के बदलते स्वरूप के प्रति खेद प्रकट किया है। कवि कहता है कि हिन्दुस्तानी नाम और उत्पादन को देखकर सभी लोग लेने से सकुचाते हैं और लजाते हैं। सारी भारतीय वस्तुओं से घृणा करते हैं। खेद की बात है कि सारी दुनिया के लोग अपने अस्तित्व और इतिहास की रक्षा करते हैं, सभ्यता और संस्कृति के पक्षधर हैं, जबकि हम अपने ही घर में, देश में अपने लोगों, अपनी वस्तुओं और अपनी भाषा एवं नाम से घृणा करते हैं। अंग्रेजियत को पसंद करते हैं। यह हमारे लिए काफी चिंतनीय है।

 

इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कहना चाहता है हम अपनी नागरी भाषा को भूल गए हैं। सभी लोग अंग्रेजी चाल-ढाल में ढलते जा रहे हैं। हाट-बाट में भी अंग्रेजी माल की भरमान है और देशी-माल की ओर लोगों की निगाह भी नहीं जाती। सभी लोग पाश्चात्य संस्कृति, पहनावा, खान-पान, उत्पादनों के उपभोग में रुचि ले रहे हैं। यह हमारे लिए शर्म की बात है। हम भारतीय हैं तो भारतीयता के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन हम पथ-विमुख होकर जी रहे हैं।

 

स्वदेशी कवि परिचय

 

प्रेमघन जी भारतेन्दु युग के महत्त्वपूर्ण कवि थे । उनका जन्म 1855 ई० में मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ और निधन 1922 ई० में। वे काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना आदर्श मानते थे । वे निहायत कलात्मक एवं अलंकृत गद्य लिखते थे। उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया था। 1874 ई० में उन्होंने मिर्जापुर में रसिक समाज की स्थापना की। उन्होंने आनंद कादंबिनी मासिक पत्रिका तथा नागरी नीरद नामक साप्ताहिक पत्र का संपादन किया । वे साहित्य सम्मेलन के कलकत्ता अधिवेशन के सभापति भी रहे । उनकी रचनाएँ प्रेमघन सर्वस्व नाम से संग्रहीत हैं।

 

प्रेमघन जी निबंधकार, नाटककार, कवि एवं समीक्षक थे । भारत सौभाग्य, ‘प्रयाग रामागमन उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। उन्होंने जीर्ण जनपद नामक एक काव्य लिखा जिसमें ग्रामीण जीवन का यथार्थवादी चित्रण है । प्रेमघन ने काव्य-रचना अधिकांशत: ब्रजभाषा और अवधी में की, किंतु युग के प्रभाव के कारण उनमें खड़ी बोलीं का व्यवहार और गद्योन्मुखता भी साफ दिखलाई पड़ती है । उनके काव्य में लोकोन्मुखता एवं यथार्थ-परायणता का आग्रह है । उन्होंने राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपना सहचर बनाया एवं साम्राज्यवाद तथा सामंतवाद का विरोध किया ।

 

प्रेमघन सर्वस्व से संकलित दोहों का यह गुच्छ स्वदेशी शीर्षक के अंतर्गत यहाँ प्रस्तुत है। इन दोहों में नवजागरण का स्वर मुखरित है। दोहों की विषयवस्तु और उनका काव्य-वैभव इसके शीर्षक को सार्थकता प्रदान करते हैं । कवि की चिंता और उसकी स्वरभंगिमा आज कहीं

अधिक प्रासंगिक है।

 

स्वदेशी - पाठ का अर्थ

 

भारतेन्दु युग के प्रतिनिधि कवि प्रेमधन जी हिन्दी साहित्य के प्रखर कवि है। ये काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना आदर्श मानते थे। प्रेमधन जी निबंधकार नाटककार कवि एवं समीक्षक थे। इनकी काव्य रचना अधिकांशतः ब्रजभाषा और अवधी में है

युग के प्रभाव से खड़ी बोली का व्यवहार और गधोन्मुखता साफ झलकती है।

 

प्रस्तुत कविता में कवि राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपना सहचर बनाकर साम्राज्यवाद एवं सामंतवाद का विरोध किया है। लोगों की सोच उनके कुंठित मानसिकता का परिणाम है। आज विदेशियों वस्तुओं में लोगों की आसक्ति बढ़ गई है। भारतीयता का कहीं नामोनिशान नहीं दिखता है। हिन्दु, मुस्लमान, ईसाई आदि सभी पाश्चात्य संस्कृति को धड़ले से अपना रहे हैं। पठन-पाठन, खान-पान, पहनावा आदि सभी विदेशियों चीजों की तरफ आकर्षित हो गये हैं।

 

आज सर्वत्र अंग्रेजी का बोल-बाला है। पराधीन भारत की दुर्दशा बढ़ती जा रही है। हिन्दुस्तान के नाम लेने से कतराते हैं। बाजारों में अंग्रेजी वस्तुओं की भरमार है। स्वदेशी वस्तुओं को हेय की दृष्टि से देखते हैं। नौकरी पाने के लिए ठाकुर सुहाती करने में लगे हैं। वस्तुत: यहाँ कवि समस्त भारतवासियों को नवजागरण का पाठ पढ़ाना चाहता है। पराधीनता की बेड़ी को तोड़कर एक नया भारत की स्थापना करना चाहता है।

 

शब्दार्थ

गति : स्वभाव

रति : लगाव

रोत : पद्धति

मनुज भारती : भारतीय मनुष्य

क्रिस्तान : क्रिश्चियन, अंग्रेज

बसन : वस्त्र

बानक : बाना, वेशभूषा

खामखयाली : कोरी कल्पना

चारह बरन : चारों वर्गों में

डफाली : डफ बजानेवाला, बाजा बजानेवाला


The   End 

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