Page 437 CLASS 10TH HISTORY NCERT BOOK SOLUTIONS Chapter 8. प्रेस – संस्कृति एवं राष्ट्रवाद

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पाठ 8 – प्रेस – संस्कृति एवं राष्ट्रवाद

वस्तुनिष्ठ प्रश्न :

प्रश्न 1. महात्मा गाँधी ने किस पत्र का संपादन किया ?

(क) कामनवील

(ख) यंग इंडिया

(ग) बंगाली

(घ) बिहारी

उत्तर: (ख) यंग इंडिया

प्रश्न 2. किस पत्र ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए अपनी भाषा बदल ली ?

(क) हरिजन

(ख) भारत मित्र

(ग) अमृतबाजार पत्रिका

(घ) हिन्दुस्तान रिव्यू

उत्तर: (ग) अमृतबाजार पत्रिका

प्रश्न 3. 13 वीं सदी में किसने ब्लाक विटिंग के नमूने यूरोप में पहुँचाए ?

(क) मार्कोपोलो

(ख) निकितिन

(ग) इत्सिंग

(घ) मेगास्थनीज

उत्तर: (क) मार्कोपोलो

प्रश्न 4. गुटेनवर्ग का जन्म किस देश में हुआ था ?

(क) अमेरिका

(ख) जर्मनी

(ग) जापान

(घ) इंग्लैंड
उत्तर
: (ख) जर्मनी

प्रश्न 5. गुटेनवर्ग ने सर्वप्रथम किस पुस्तक की छपाई की?

(क) कुरान

(ख) गीता

(ग) हदीस

(घ) बाइबिल
उत्तर
: (घ) बाइबिल

प्रश्न 6. इंग्लैंड में मुद्रणकला को पहुँचाने वाला कौन था ?

(क) हैमिल्टन

(ख) कैक्सटन

(ग) एडिसन

(घ) स्मिथ

उत्तर: (ख) कैक्सटन

प्रश्न 7. किसने कहा "मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम् देन है, सबसे बड़ा तोहफा' ?

(क) महात्मा गाँधी
(ख) मार्टिन लूथर

(ग) मुहम्मद पैगम्बर

(घ) ईसा मसीह

उत्तर: (ख) मार्टिन लूथर

प्रश्न 8. रूसो कहाँ का दार्शनिक था ?

(क) फ्रांस

(ख) रूस

(ग) अमेरिका

(घ) इंगलैंड

उत्तर: (क) फ्रांस

प्रश्न 9. विश्व में सर्वप्रथम मुद्रण की शुरुआत कहाँ हुई ?

(क) भारत

(ख) जापान

(ग) चीन

(घ) अमेरिका

उत्तर: (ग) चीन

प्रश्न 10. किस देश की सिविल सेवा परीक्षा ने मुद्रित पुस्तकों की माँग बढ़ाई ?

(क) मिस्र

(ख) भारत

(ग) चीन

(घ) जापान
उत्तर
: (ग) चीन

 

रिक्त स्थानों को भरें :

1. 1904-05 के रूस-जापान युद्ध में ......... की पराजय हुई।
उत्तर
: रूस

2. फिरोज शाह मेहता ने ......... का संपादन किया।
उत्तर
: बाम्बे कॉनिकल

3. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट ......... ई. में पास किया गया।
उत्तर
: 1878

4. भारत्तीय समाचार पत्रों के मुक्तिदाता के रूप में ......... को विभूषित किया गया।
उत्तर
: चार्ल्स मेटकॉफ

5. अल-हिलाल का सम्पादन ......... ने किया।
उत्तर
: मौलाना आजाद ।

उत्तर: 1. रूस, 2. बाम्बे कॉनिकल, 3. 1878, 4. चार्ल्स मेटकॉफ, 5. मौलाना आजाद ।


सुमेलित करें :

समूह ''

समूह ''

(i) जे. वे. हिक्की

(क) संवाद कौमुदी

(ii) राममोहन राय

(ख) बंगाली

(iii) बाल गंगाधर तिलक

(ग) बंगाल गजट

(iv) केशवचन्द्र सेन

(घ) मराठा

(v) सुरेन्द्र नाथ बनर्जी

(ङ) सुलभ समाचार

उत्तर: (1) → (ग) , (ii) → (क) , (iii) → (घ) , (iv) →(ङ) , (v) →(ख)


प्रश्न
1. निम्नांकित के बारे में 20 शब्दों में लिखें :

(क) छापाखाना, (ख) गुटेनवर्ग, (ग) बाइबिल, (घ) रेशम मार्ग, (ङ) मराठा, (च) यंग इण्डिया, (छ) वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, (ज) सर सैयद अहमद, (झ) प्रोटेस्टेन्टवाद, (ञ) मार्टिन लूथर।

उत्तर:
(क) छापाखाना- छापाखाना के आविष्कार का उतना ही महत्त्व है जितना आदि मानव द्वारा 'आग', 'पहिया' और 'लिपि' का। आरंभ में छापाखाना को अजूबा ही समझा गया। बौद्धिक जगत के लिए गुटेनवर्ग की यह अनुपम देन थी।

 

(ख) गुटेनवर्ग- गुटेनवर्ग जर्मनी का रहनेवाला था। आधुनिक छापाखानों (Printing Press) का आविष्कारक गुटेनवर्ग को ही माना जाता है। उसी ने टाईप बनाया और छपाई की मशीन भी। आगे चलकर प्रेसों का क्रमशः विकास होता गया।

 

(ग) बाइबिल- बाईबिल एक ईसाई धर्म ग्रंथ है। ईसाई इसे सर्वाधिक पवित्र मानते हैं। गुटनवर्ग ने जब प्रेस बनाकर छपाई का प्रयोग करना चाहा तो उसने सबसे पहले बाइबिल को ही छापा। बाइबिल छापना उसने शुभ कर्म माना।

 

(घ) रेशम मार्ग- चीन से रेशम का निर्याता यूरोप तक के देशों में होता था। रेशम व्यापार का इतना महत्त्व था कि जिस मार्ग से होकर यह भेजा जाता था, उस मार्ग का नाम ही 'रेशम मार्ग' पड़ गया। रेशम मार्ग परिश्म एशिया से होकर गुजरता था।

 

(ङ) मराठा- 'मराठा' एक उम्र विचारों को व्यक्त करने वाला राष्ट्रवादी समाचार पत्र था। इसके सम्पादक बाल गंगाधर तिलक थे। इसका नाम तो 'मराठा' था, किन्तु छपता अंग्रेजी में था।

 

(च) यंग इण्डिया- अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित 'यंग इण्डिया' एक देश भक्ति पूर्ण राष्ट्रवादी पत्र था। इसके संस्थापक तथा सम्पादक महात्मा गाँधी थे। यह अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होने वाला समाचार पत्र था। इसके लेखों से भारतीय युवक देश भक्ति की शिक्षा लेते थे।

 

(छ) वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1878 में लागू हुआ था। यह एक्ट केवल भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार पत्रों पर लागू होता था। इसी एक्ट से बचने के लिए बंगला में प्रकाशित होने वाला समाचारपत्र अमृत बाजार पत्रिका को अंग्रेजी भाषा में छापा जाने लगा।

 

(ज) सर सैयद अहमद- सर सैयद अहमद इस्ट इण्डिया कम्पनी में एक किरानी थे। अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए एक कट्टर मुसलमान की आवश्यकता थी, क्योंकि 57 के गदर में हिन्दू-मुस्लिम एकता परवान पर थी। सैयद साहब अंग्रेजों के इशारे पर चलते रहे, जिससे उन्हें 'सर' की उपाधि से नवाजा गया।

 

(झ) प्रोटेस्टेन्टवाद- प्रोटेस्टेन्टवाद का संचालक मार्टिन लूथर था। वह पोप और पादरियों के चरित्र में आई गिरावट से क्षुब्ध था। इसी का फल हुआ कि ईसाई धर्म दो खेमों में बँट गया। मूल खेमा कैथोलिक कहलाया और इसका प्रोटेस्ट करने वाला खेमा प्रोटेस्टेन्ट कहलाया।

 

() मार्टिन लूथर- मार्टिन लूथर जर्मनी का एक धर्म सुधारक था। यह पोप और पादरियों के चरित्र में आए गिरावट से क्षुब्ध था, जिस कारण उसे धर्म सुधार आन्दोलन बलाना पड़ा। इसमें उसे सफलता भी मिली। एक ओर पोप को तो अपने में सुधार लाना ड़ा और दूसरी ओर ईसाई धर्म के दो फांक हो गए।

 

प्रश्न 2. निम्नांकित प्रश्नों के उत्तर 60 शब्दों में लिखें:

प्रश्न (क) गुटेनबर्ग ने मुद्रणयंत्र का विकास कैसे किया ?

उत्तर: गुटेनवर्ग के परिवार के पास जैतून से तेल निकालने की मशीन थी। उसने उसी मशीन में कुछ हेर-फेर करके मुद्रणयंत्र का विकास कर लिया। टाईप के लिए तीन-चार धातुओं का मिश्रण बना टाईप बनाए। पहले अक्षरों के मोल्ड बनाया और उन मोल्डों के सहारे टाईप की ढलाई की गई। अंग्रेजी में चूँकि अक्षरों की संख्या बहुत कम है, अतः टाईप बनाना आसान हो गया। फिर उसने छपाई योग्य स्याही भी बना ली। इस प्रकार कुछ दिनों के परिश्रम के बाद वह मुद्रण यंत्र बनाने को विकसित करने में सफल हो गया।

 

प्रश्न (ख) छापाखान्मा यूरोप में कैसे पहुँचा ?

उत्तर: कहा जाता है कि छापाखाना को यूरोप पहुँचाने वाला मार्कोपोलो था, जो अपनी यात्रा के क्रम में चीन पहुँचा था। लेकिन उसके पहले ही व्यापारियों द्वारा रेशम मार्ग से छापाखाना यूरोप पहुँच चुका था। वहाँ छापाखाना का उपयोग ताश और धार्मिक चित्र बनाने में करते थे। लेकिन मार्कोपोलो ने छापाखाने के साथ ही लकड़ी के टाईप भी भेजे। जर्मनी में कागज का आविष्कार 1336 में हो गया। इसके बाद तो छपाई का काम तेजी से बढ़ने लगा, क्योंकि छापाखाने की मशीन गुटेनवर्ग ने पहले ही बना ली थी।

 

प्रश्न (ग) इन्क्वीजीशन से आप क्या समझते हैं? इसकी जरूरत क्यों पड़ी ?

उत्तर: 'इन्क्वीजीशन' वह कार्यकलाप था, जिसके माध्यम से कैथोलिक चर्च के पादरियों ने धर्म-सुधार की कार्रवाइयों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। बाइबिल की मुद्रित्न प्रतियों के मिलने से कम पढ़े-लिखे लोग भी बाइबिल में उल्लिखित बातों का अपने मतानुसार अलग-अलग अर्थ निकालने लगे। उनकी व्याख्या भी वे अपने ढंग से करते थे, जो चर्च की मान्याताओं के विरुद्ध जाते थे। अपनी जमी-जमाई दुकानदारी को नष्ट होने से बचाने के लिए कैथेलिक चर्च वालों ने 'इन्क्वीजीशन' को चालू किया। लेकिन इससे धर्म सुधार आन्दोलन रुका नहीं, वरन जोर पकड़ने लगा।

 

प्रश्न (घ) पाण्डुलिपि क्या है? इसकी क्या उपयोगिता है?

उत्तर: पाण्डुलिपि हस्तलिखित उस पुस्तक या समग्री को कहते हैं, जिसे देखकर आधुनिक काल में कम्पोज होता है और छपाई होती है। जब मुद्रण यंत्र की सुविधा नहीं थी तब विश्व में अकेला देश भारत ही था, जहाँ अत्यन्त स्थाई और महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी गई। रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद आदि पाण्डुलिपियाँ ही थीं, जो बाद में पुस्तक के रूप में मुद्रित की गई। पहले वह तालपत्रों तथा विभिन्न प्राकृतिक उपकरणों पर लिखी जाती थीं। पाण्डुलिपि की उपयोगिता है कि ये हजारों-लाखों वर्ष तक सुरक्षित रखी जा सकती हैं या इनसे लाखों-लाख पुस्तकें छापी जा सकती हैं।

प्रश्न (ङ) "लार्ड लिटन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिमान बनाया।" कैसे?

उत्तर: 1910 में लार्ड लिटन ने 1878 के एक्ट के सभी घिनौने प्रावधानों को पुनः लागू कर दिया। देश में इसकी घोर प्रतिक्रिया हुई। यह वह काल था, जब कांग्रेस में नरम-दल और गरमदल अलग राग अपनाने में व्यस्त थे। लॉर्ड लिटन के कानून से स राष्ट्रवादी एक स्वर में बोलने लगे। राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई संजीवनी मिल गई। 1921 में तेज बहादुर सम्र की अध्यक्षिता में एक प्रेस कमिटि बनी। इसकी सिफारिश पर 1910 के अधिनियम को रद्द कर देना पड़ा। इसी कारण कहा जाता है कि लॉर्ड लिटन नै राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिमान बनाया।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें):

प्रश्न (क) मुद्रण क्रांति ने आधुनिक विश्व को कैसे प्रभावित किया ?

उत्तर: मुद्रण कांति ने आधुनिक विश्व को अनेक प्रकार से प्रभावित किया। सबसे पहले तो अनपढ़ जनता पढ़ने की ओर उन्मुख हुई। कारण कि पढ़े-लिखे लोग ही मुद्रित पुस्तकों को पढ़ सकते थे और उनसे लाभ उठा सकते थे।

मुद्रण संस्कृति ने तो सर्वप्रथम धर्म को प्रभावित किया। उसी समय यूरोप में धर्मसुधार आन्दोलन चल रहा था। मुद्रण की सुविधा प्राप्त होते ही उसमें और भी तेजी आ गई। बाइबिल के संस्करण पर संस्करण प्रकाशित होने लगे। इसको खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बढ़ने लगी।

सबसे बड़े धर्म सुधारक जर्मनी का मार्टिन लूथर ने तो यहाँ तक कहा कि- "मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफा है।" छपाई के काम से नये बौद्धिक माहौल का निर्माण हुआ एवं धर्म सुधार आन्दोलन के नए विचारों का फैलाव तेजी से हुआ और वह आम जन तक आसानी से पहुँचने लगा ।

मुद्रण कला की तकनीकी विकास भी तेजी से हुआ। अब बिजली से चलने वाले बेलनाकार मशीनें भी बाजार में आ गई। यहाँ तक कि ऑफसेट में बहुरंगी छपाई भी होने लगी। अब प्रेस केवल धर्म प्रचार का ही साधन नहीं रहा, बल्कि ज्ञान-विज्ञान तथा विचारों का फैलाव भी तेजी से हुआ।

भारत में तो मुद्रण क्रांति ने राजनीति को पूरी तरह अपने लपेटे में ले ली। राष्ट्रीय आन्दोलन को फैलाने में बहुत मदद मिली। देश में अनेक राष्ट्रवादी अखबार छपने लगे। पाठकों की संख्या भी बढ़ने लगी। राष्ट्रवादी नेता अपने विचार अखबारों के माध्सम से जन-जन तक पहुँचाने लगे। यद्यपि कि सरकारी नजर सदैव टेढ़ी ही रहती थी। अनेक तरह के कानून लादे गए। अड़चनें लगाई गई। वास्वत में सही रूप से राष्ट्रवादी और त्यागी ही अखबार निकाल सकते थे और सम्पादन कर सकते थे।

 

प्रश्न (ख) 19वीं सदी में भारत में प्रेस के विकास को रेखांकित करें।

उत्तर: -भारत में समाचारपत्रों का उदय 19वीं सदी की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यह न सिर्फ विचारों को तेजी से फैलाने वाला अनिवार्य शैक्षणिक स्रोत बन गया, बल्कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भारतीयों की भावना को एक रूप देने, उनकी नीतियों, उनके शोषण के विरुद्ध जागृति लाने एवं देश प्रेम की भावना भरकर राष्ट्र निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला बन गया।

   1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने साप्ताहिक बंगाल गजट निकाला तो 1818 में बिटिश व्यापारियों ने कलकत्ता जर्नल निकाला। इन समाचार पत्रों ने लार्ड हेस्टिंग और जॉन एडमून को उलझन में डाल दिया। इस पत्र के सम्पादक बकिंघम ने पत्रकारिता के माध्यम से प्रेस को जनता तक पहुँचा दिया। इसने प्रेस को आचोलनात्मक दृष्टिकोण अपनाने, जाँच-पड़ताल करके समाचार देने तथा नेतृत्व प्रदान करने की ओर प्रवृत्त किया। परिणाम हुआ कि इस्ट इण्डिया कम्पनी ने इन्हें इंग्लैंड भेज दिया।

   1821 में बंगला भाषा में 'सम्वाद कौमुदी' तथा 1822 में फारसी भाषा में 'मिरातुला'

अखबार निकला। इसके साथ ही प्रगतिशील राष्ट्रवादी प्रकृति के समाचार पत्रों का तांता लग गया। उपर्युक्त दो पत्रों के सम्पादक बंगाल के प्रकाण्ड विद्वान राजा राममोहन राय थे। इन्होंने अखबारों को सामाजिक तथा धार्मिक सुधार आन्दोलनों का हथियार बना दिया। 1822 में बम्बई से गुजराती भाषा में 'दैनिक बम्बई' समाचारपत्र निकलता तो 1831 में 'जामे जमशेद', 1851 में 'गोफ्तार' तथा 'अखवारे सौदागर' का प्रकाशन हुआ ।

   1857 के विद्रोह के पश्चात समाचार पत्रों की प्रकृति का विभाजन प्रांतीय आधार पर किया जा सकता है। भारत में दो प्रकार के प्रेस थे एक एंग्लो इण्डियन तथा दूसरा भारतीय प्रेस। एंग्लो इण्डियन प्रेस में पत्र छपते थे, वे 'फूट डालो और शासन करो' के तर्ज पर थे, जबकि भारतीय प्रेस मेल-मिलाप और राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत होते थे ।

   1858 में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने 'सोम प्रकाश' नामकं साप्ताहिक पत्र निकाला, जो बंगला में थे। हिन्दू पेट्रिएट को भी विद्यासागर ने ले लिया। ऐसे ही अनेक समाचारपत्रों का प्रकाशन होता रहा।

 

प्रश्न (ग) भारतीय प्रेस की विशेषताओं को लिखें।

उत्तर: भारतीय समाचार पत्रों को राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रचार के हथियार के रूप में एनीबेसेंट ने इस्तेमाल करना शुरू किया। इन्होंने मद्रास स्टैंडर्ड को अपना संचालन में लेकर 'न्यू इण्डिया' नाम देकर होमरूल का नारा जन-जन तक पहुँचाया। महात्मा गाँधी केवल राजनीतिज्ञ ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल पत्रकार भी थे। इन्होंने यंग इण्डिया तथा हरिजन पत्रों के माध्यम से अपने विचारों एवं राष्ट्रवादी आन्दोलन का प्रचार-प्रसार किया । भारतीय प्रेस गाँधीजी के वक्तव्यों और व्यक्तित्व से निभीक बनने लगे।

मोतीलाल नेहरू ने 1919 में 'इंडिपेंडेस', शिव प्रसाद गुप्त ने 'आज', के. एम. पन्निकर ने 1922 में हिन्दुस्तान टाइम्स का सम्पादन किया। बाद में हिन्दुस्तान टाइम्स का सम्पादन कार्य मदन मोहन मालवीय के हाथ में आ गया। बाद में घनश्याम दास बिड़ला ने इस पत्र को खरीद लिया। समाजवादी-साम्यवादी विचारों के फैलाव के परिणामस्वरूप मराठी साप्ताहिक क्रांति, वर्क्स एण्ड पीजेंट्स पार्टी ऑफ इण्डिया का प्रतिनिधित्व कर रहा था। अंग्रेजी साप्ताहिक न्यू स्पार्क, कांग्रेस सोशलिस्ट क्रमशः मार्क्सवादी एवं समाजवादी विचारों के पोषक थे। एम० एन० राय ने अंग्रेजी साप्ताहिक 'इंडिपेंडेन्ट', 1930 में एस. सदानन्नद के सम्पादन में 'दि फ्री प्रेस जनरल' का प्रकाशन आरम्भ हुआ। मद्रास में स्वराज तथा गुजरात में नवजीवन का प्रकाशन शुरू हुआ।

   1910-20 के मध्य उर्दू पत्रकारिता का भी खूब विकास हुआ। मौलाना आजाद के सम्पादन में 1912 में 'अलहिलाल' तथा 1913 में 'अल बिलाग' का प्रकाशन हुआ । मोहम्मद अली ने अंग्रेजी में 'कामरेड' तथा उर्दू में 'हमदर्द' का प्रकाशन किया। 1910 में गणेशंकर विद्यार्थी ने कानपुर से 'प्रताप' का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्र राष्ट्रवाद तथा किसान-मजदरा का जबरदस्त समर्थक था। हरदयाल ने 1913 में गदर का प्रकाशन सेन फ्रांसिस्को से करना आरम्भ किया। 1914 से पंजाबी में भी इसका प्रकाशन हुआ। विदेशों में रहने वाले भारतीयों के बीच यह पत्र काफी लोकप्रिय हुआ।

 

प्रश्न (घ) राष्ट्रीय आन्दोलन को भारतीय प्रेसों ने कैसे प्रभावित किया?

उत्तर: भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के सभी पक्षों, चाहे वह राजनीति हो, चाहे सामाजिक हो, चाहे आर्थिक हो, प्रेस ने प्रत्यक्ष रूप से सबको प्रभावित किया। राष्ट्रीय नेताओं ने प्रेस के माध्यम से ही अंग्रेजी राज की शोषणकारी नीतियों का प्रर्दापाश किया। इस क्रम में उन्होंने देश में जागृति फैलाने का भी काम किया। विदेशी सत्ता से त्रस्त जनता को सन्मार्ग दिखाने एवं साम्राज्यवाद के विरोध में निडर होकर स्वर उठाने का साहस प्रेसों के माध्ये से ही प्राप्त हुआ।

  भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रारंभ से पहले समाचार पत्र ही देश में लोकमत का निर्माण भी करते थे और प्रतिनिधित्व भी करते थे। देश भक्तों ने लाभ या व्यापारिक उद्देश्य से पत्रकारिता को नहीं अपनाया, बल्कि इसे मिशन के रूप में अपनाया। चन्दा और दान इनकी पूँजी थी। उन्होंने समाचारपत्रों ने राजनीतिक शिक्षा देने का भी काम किया। अधिकतर समाचारपत्रों का रूख कांग्रेस की याचनावादी नीतियों से भिन्न थी। ये गरमदल 'का प्रतिनिधित्व करते थे और उन्हीं के स्वर को उजागर करते थे। सालों भर कांग्रेस अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों की चर्चा होती रहती थी।

   नई शिक्षा नीति के प्रति व्यापक असंतोष को सरकार के कानों तक पहुँचाने का काम समाचर पत्रों ने ही किया। फिरंगियों द्वारा हो रहे भारत के आर्थिक शोषण को इन्होंने ही उजागार किया और करते रहे। देश की आर्थिक दुर्दशा का चित्रण भी प्रेस या समाचार पत्र ही करते थे। 'भारत मित्र' नामक समाचार पत्र ने भारत से चावल के निर्यात का विरोध किया। अधिकांश समाचार पत्रों का कहना था कि भारत की वास्तविक समस्या राजनीति से बढ़कर आर्थिक थी। गाँवों में कृषकों तथा दस्तकारों की हालत अत्यंत शोचनीय थी। वे सदा कर्ज के बोझ तले दबे रहते थे।

   सामाजिक सुधार के क्षेत्र में प्रेसों ने सामाजिक रुढ़ियों, रीति-रिवाजों अंधविश्वासों तथा अंग्रेजी सभ्यता के कुप्रभाव को लेकर आलोचनात्मक लेख प्रकाशित करते रहे। राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, केशव चन्द्र सेन आदि जैसे समाज सुधारक सदा प्रेस के लिए लिखते रहे।

 

प्रश्न (ङ) मुद्रण यंत्र की विकास यात्रा को रेखांकित कीजिए। यह आधुनिक रूप में कैसे पहुँचा ?

उत्तर: आज विश्व ने जो प्रगति की है, उसकी जड़ में प्रेस-संस्कृति ही रही है। यदि प्रेस का विकास नहीं हुआ रहता तो आज न तो वैज्ञानिक पुस्तके उपलब्ध हो पाती और न ही विज्ञान की उन्नति हो पाती। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रेस संस्कृति को आज की स्थिति में पहुँचाने के लिए प्रबुद्ध लोगों को कितने पापड़ बेलने पड़े थे। तालपत्रों पर हाथ से लिखने के बाद कागज पर लिखकर पुस्तकें तैयार होने लगीं। कागज का आविष्कार चीन में हुआ लेकिन मुद्रण का शुरुआत यूरोप में हुआ। चीनी बौद्ध प्रचारकों ने जापान में मुद्रण कला को पहुँचाया तो यूरोप में मार्कोपोलो ने मुद्रणकला को पहुँचाया। वह इसे चीन से ही ले गया था। जर्मनी में गुटेन्वर्ग ने पहली मुद्रण मशीन बनाई। बाद में जर्मनी में ही बेहतर मुद्रण मशीनें बनीं। जर्मनी से ये पूरे यूरोप और बाद में भारत तथा अन्य देशो में पहुँच गयीं। पहले तो धार्मिक पुस्तकें ही छपी, बाद में आधुनिक विद्वानों के विचार छपने लगे। इससे समाज के दबे-कुचले दलितवर्ग में चेतना का संचार हुआ। मुद्रण संस्कृति ने चर्चा के पाखंड को खोला तो राजाओं की मनमानी के विरुद्ध भी जनता को जागृत किया। राजतंत्र के विरुद्ध आन्दोलन हुए और प्रजातंत्र का समर्थन किया गया। प्रेस-संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति में घना सम्बंध था। चर्च और राजाओं ने मुद्रण संस्कृति का विरोध तो किया लेकिन वे इसमें सफल नहीं हुए। प्रेस-संस्कृति से कारखानों के कामगारों में भी चेतना का विकास हुआ। वे मालिकों से अपने लिए सुविधाओं की माँग मनवाने में समर्थ हुए।

 प्रेस-संस्कृति से भारत भी अछूता नहीं रहा। भारत में भी प्रेस-संस्कृति पर लगाम कसने का प्रयास हुआ, लेकिन यहाँ पंडे-पुजारियों द्वारा नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासकों द्वारा। वे मुद्रण संस्कृति के प्रसार को अपने लिए खतरा समझते थे। लेकिन वे इसे पूरी तरह दवा पाने में सफल नहीं हुए। मुद्रण संस्कृति ने भारत में श्चार्मिक सुधार आन्दोलनों को बल दिया। अब मुद्रण में विविधता आने लगी थी। पुस्तकों के तथ्यों को सिद्ध करने के लिए चित्रों की सहायता ली जाने लगी। मुद्रण संस्कृति के विकास से भारतीय महिलाएँ भी शिक्षा की ओर उन्मुख हुई। गरीब जनता ने भी मुद्रण संस्कृति का लाभ उठाया। बाद में ब्रिटिश शासकों को प्रेस-संस्कृति से अपने शासन पर खतरा महसूस होने लगा, जिससे उन्होंने प्रेसों पर अनेक पाबंदी लगाए।


The   End 

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