Page 438 CLASS 10TH GEOGRAPHY NCERT BOOK SOLUTIONS Unit 1. (क) भूमि संसाधन

 Contact for Notes , Objective , Subjective Questions & Answers of any Subject - किसी भी विषय के नोट्स, वस्तुनिष्ठ, दीर्घ प्रश्न व उत्तर के लिए संपर्क करें - ₹35/Subject

प्राकृतिक संसाधन
(क) भूमि संसाधन

वस्तुनिष्ठ प्रश्न :

प्रश्न 1. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है ?

(a) वनोन्मूलन

(b) गहन खेती

(c) अति-पशुचारण

(d) अधिक सिंचाई

उत्तर: (a) वनोन्मूलन

प्रश्न 2. सोपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है ?

(a) हरियाणा

(b) पंजाब

(c) बिहार का मैदानी क्षेत्र

(d) उत्तराखंड

उत्तर: (c) बिहार का मैदानी क्षेत्र

प्रश्न 3. मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में से कहाँ है ?

(a) उत्तर प्रदेश

(b) राजस्थान

(c) कर्नाटक

(d) महाराष्ट्र
उत्तर:
(b) राजस्थान

प्रश्न 4. मेढ़क के प्रजनन को नष्ट करने वाला रसायान कौन है ?

(a) बेंजीन

(b) यूरिया

(c) एंड्रिन

(d) फॉस्फोरस

उत्तर: (c) एंड्रिन

प्रश्न 5. काली मृदा का दूसरा नाम क्या है ?

(a) बलुई मृदा

(b) रेगुर मृदा

(c) लाल मृदा

(d) पर्वतीय मृदा
उत्तर:
(b) रेगुर मृदा

लघु उत्तरीय प्रश्न :

प्रश्न 1. जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्यों के नाम बताएँ। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगाई जा सकती हैं?
उत्तर: जलोढ़ मृदा का विस्तार उत्तर भारत के पूरे मैदानी क्षेत्र में है। राजस्थान तथा गुजरात के भी कुछ क्षेत्र में जलोढ़ मृदा पाई जाती है। यह वहाँ एक सँकरी पट्टी के रूप में सिमटी हुई है।

   जलोढ़ मृदा में गन्ना, धान, गेहूँ, मक्का, दलहन- जैसे अरहर, चना, मूँग, उड़द, मटर, मसूर आदि फसलें प्रमुखता से लगाई या उपजाई जा सकती हैं।

 

प्रश्न 2. समोच्च कृषि से आप क्या समझते हैं?

उत्तर: समोच्च कृषि से तात्पर्य समोच्च जोताई द्वारा की जाने वाली कृषि से है। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में, जहाँ वर्षा जल तीव्रता से ढाल पर बह जाता है और अपने साथ उपजाऊ मिट्टी भी बहा ले जाता है, को रोकने के लिए समोच्च जोताई की जाती है। इससे वर्षा जल उपजाऊ मिट्टी को बहाने नहीं पाती तथा खेत में नमी भी बनी रहती है।

 

प्रश्न 3. पवन अपरदन वाले क्षेत्र में कृषि की कौन-सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है?

उत्तर: पवन अपरदन वाले क्षेत्र में पट्टिका कृषि उपयोगी मानी जाती है। इस कृषि पद्धति में फसलों के बीच घास की पट्टियाँ विकसित की जाती हैं। इन घास की पट्टियों के कारण पवन का जोर खेत की मिट्टी को उड़ा पाने में सक्षम नहीं हो पाता। इसके अलावा ध्यान रखा जाता है कि खेत कभी खाली नहीं रहने पावे। इसके लिए अनवरत कृषि पद्धति भी अपनानी पड़ती है।

 

प्रश्न 4. भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है। यहाँ की मृदा की क्या विशेषता है?

उत्तर: भारत के पूर्वी तट के अनेक क्षेत्रों में डेल्टा का विकास हुआ है। पश्चिम बंगाल में गंगा का डेल्टा विश्व प्रसिद्ध है। इसके अलावे महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदी के मुहानों पर डेल्टा का विकास हुआ है।

   यहाँ की मृदा की विशेषता है कि इन सभी डेल्टाओं पर जलोढ़ मृदा पाई जाती है, जो काफी उपजाऊ होती है। स्थानानुसार डेल्टाओं पर धान, जूट, पाट कुछ गेहूँ, मक्का, 'दलहन आदि उपजाए जाते हैं।

 

प्रश्न 5. फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है?

उत्तर: फसल चक्रण का अर्थ है कि प्रति वर्ष फसलों को अदल-बदल कर कृषि की जाय। खेत में यदि एक वर्ष धान्य फसलें बोई गईं तो अगले वर्ष दलहन फसल अवश्य बोई जाय। दलहन फसल के पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है, जिससे भूमि की उपज शक्ति बनी रहती है। इसी प्रकार कपास और तेलहन की खेती भी बारी-बारी से करने से मृदा संरक्षण में सहायता मिलती है।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न :

प्रश्न 1. जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होती है? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है?

उत्तर: अधिक सिंचाई या अतिवर्षण से जलाक्रांतता उपस्थित होती है। मृदा अपरदन में इसकी भूमिका यह होती है कि मृदा में लवणीयता तथा क्षारीयता की वृद्धि हो जाती है। इस कारण भूमि का निम्नीकरण हो जाता है और उसकी उपज शक्ति क्षीण हो जाती है। परिणामतः अन्न की कमी होने लगती है, जिससे अकाल का सामना करना पड़ता है। वैसी भूमि में ऐसा कुछ भी नहीं उपजता, जिसके बदले खाद्यान्न प्राप्त किया जा सके।

   ऐसी निम्नीकरण वाली भूमि आधुनिक मानव सभ्यता के लिए विकट समस्या है। मानव सभ्यता के लिए यह एक चुनौती है। लेकिन यदि मानव को जीवित रहना है, सभ्यता को कायम रखना है तो हमें इस चुनौती को स्वीकार करना पड़ेगा। कुछ ऐसे उपाय करने होंगे कि भूमि फिर से उपजाऊ बन जाय। रासायनिक उर्वरकों को त्याग कर जैविक खाद का उपयोग हो। पहले दलहन और तेलहन की खेती की जाय। उसके बाद गेहूँ या जौ बोया जाय । धीरे-धीरे कुछ वर्षों बाद वह भूमि निश्चय ही उपजाऊ हो जाएगी।

   इसके अलावा सरकार द्वारा संचालित कृषि विभाग के विशेषज्ञों से राय ली जाय। वे जैसा बताएँ उन उपायों को अपनाने से वह खेत अवश्य ही उपजाऊ हो जाएगा।

  खेत जलाक्रांत हो ही नहीं, इसके लिए आवश्यक है कि सिंचाई कम की जाय। उस खेत में वैसी फसलें लगाई जायें, जिन्हें कम जल की आवश्यकता होती हो। दूसरी बात यह है कि यदि वर्षा जल उस खेत में एकत्र होता हो तो उसे खेत से निकालने का प्रबंध किया जाय।

 

प्रश्न 2. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए ।

उत्तर: मृदा संरक्षण पर निबंध लिखने के पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि मृदा है क्या। पृथ्वी के अन्दर पाई जाने वाली सभी मिट्टी मृदा नहीं है। मृदा मात्र पृथ्वी की ऊपरी पतली परत को ही कहते हैं जिसकी गहराई अधिकाधिक 20 से 30 सेमी तक होती है। पृथ्वी पर उतनी ही गहराई तक की मिट्टी को मृदा कहते हैं, जितनी गहराई तक कृषि कार्य होता है। इसका अर्थ हुआ कि सभी मिट्टी मृदा नहीं है, लेकिन सभी मृदा मिट्टी है।

   पृथ्वी की ऊपरी सतह ही मृदा है, जिसमें कृषि कार्य किया जाता है। क्षरण भी उसी का होता है, अत्तः उसका संरक्षण आवश्यक है। मृदा के क्षरण के कई कारक हैं। ये सभी कारक प्राकृतिक हैं, जैसे- (क) तेजी से बहता हुआ जल, (ख) वेगवान पवन, (ग) हिमानी, (घ) सामुद्रिक लहरें। इन्हीं से सुरक्षा करने को मृदा संरक्षण कहते हैं। मृदा संरक्षण के अनेक उपाय हैं, जिनमें से जहाँ जिसकी आवश्यकता पड़ती है, वहाँ उसका उपयोग किया जाता है।

   गुरुत्व बल के कारण पहाड़ी ढलान की मृदा वर्षा जल के साथ बह जाती है। इसके लिए बाँध या मेड़ बनाया जा सकता है। परती पड़े खेत अर्थात खाली खेत से पवन मृदा को उड़ाकर स्थानांतरित कर देता है। इस कारण मृदा अपने मूल स्थान से हट कर कही अन्यत्र चली जाती है। इससे बचाव का उपाय है कि खेत को कभी खाली नहीं रखा जाय। या तो उसमें कोई फसल लगी रहे या कम-से-कम घास ही लगा दी जाय। खेत के चारों ओर वृक्ष लगा देने से भी पवन मृदा को नहीं उड़ा पता। इससे यह भी लाभ मिलता है कि वृक्ष के पत्ते सड़कर मृदा में ह्यूमस की वृद्धि करते हैं।

   हरित क्रांति के सफल हो जाने के पश्चात सभी किसान रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशी दवाओं का धड़ल्ले से उपयोग करने लगे हैं। इसका परिणाम हुआ है कि खेत तो अनुपजाऊ हो ही जाता है, जल प्रदूषण की समस्या भी खड़ी हो गई है। वर्षा जल के साथ वे रासायनिक वस्तुएँ बहकर जल स्रोतों में पहुँच जाती हैं, जिससे जल प्रदूषण की समस्या खड़ी हो जाती है।

   सबसे उत्तम है कि पारम्परिक खाद-जैसे गोबर को सड़ाकर तथा अन्य अनुपयोगी वस्तुओं, सब्जी के पत्ते, छिलके, राख, घर से निकले बुहारण को गढ़े में एकत्र किया जाय। इससे उत्तम कम्पोस्ट बनता है, जिन्हें खेतों में डालने से उपज तो बढ़ती है, लेकिन कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता। केंचुओं का पालन कर उन्हें खेत में डालने से उपज में वृद्धि होती है। दिनों-दिन केंचुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है।

   इन उपायों को अपनाने से अनिवार्यतः मृदा संरक्षण होता है।

 

प्रश्न 3. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थ-व्यवस्था में इनका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।

उत्तर: यह सही है कि भारत में अत्यधिक पशुधन है, लेकिन इसके बावजूद यहाँ की अर्थ-व्यवस्था में इनका योगदान लगभग नगण्य है। इसका कारण यह है कि देश में कृषि क्षेत्र बढ़ाने के चलते चरागाहों की कमी हो गई है। यदि है भी तो पर्याप्त नहीं है। फलतः पशुपालन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

   पहले सवारी के लिए घोड़ा, बैलगाड़ी, भैंसा गाड़ी आदि ही साधन थे। लेकिन सभ्यता के विकास के कारण आज मोटर गाड़ी, जैसे- जीप, कार, जिनपर सवारी की जाती है। बैलगाड़ी और भैंसा गाड़ी का स्थान ट्रकों ने ले लिया है। अब छोटे-छोटे कस्बों और बाजारों तक ट्रक सामान पहुँचा देते हैं। पहले कृषि कार्य में खेत की जुताई के लिए हल का उपयोग होता था, जिसे बैल या भैंसा खींचते थे। सिंचाई में भी मोट या रहट बैल ही खींचते थे। तेल पेरने में बैल का उपयोग होता था। लेकिन आज सभी काम मशीनों से ही होते हैं। खेत जोतने के लिए ट्रैक्चर, सिंचाई के लिए ट्यूबवेल या पारंपरिक कुआँ, जिनसे पम्प लगाकर बिजली चलित मोटर या जनेरेटर चलाकर सिंचाई कर ली जाती है। ट्रैक्टर तो माल ढोने के साथ-साथ यात्रा करने के काम में आ जाते हैं। फलतः बैल-पालन या भैंसा-पालन की ओर से लोग उदासीन हो गए हैं।

   आज केवल गाय और भैंस को ही पशुधन माना जाता है और उसी का पालन होता है। यदि गाय बाछा देती है या भैंस पाड़ा देती है तो उनको पालना लोग बोझ समझने लगे हैं। केवल छोटे किसान बैल और भैंसा रखते हैं। अतः कहना चाहिए कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था में पशुधन का योगदान नगण्य अवश्य है, किन्तु समाप्त नहीं है।


कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न तथा उनके उत्तर

 

प्रश्न 1. भूमि संसाधन क्या है?

उत्तर-सभी संसाधनों का मुख्य स्रोत भूमि ही है। जीव भूमि पर उपजे अन्न-फल या मांस-मछली खाकर जीवित रहता है। जीव, खासकर मनुष्य के संदर्भ में हम कहें तो कह सकते हैं कि मनुष्य भूमि पर ही जन्म लेता है, इसी के अन्न-जल खाकर जीवित रहता है और मृत्यु उपरान्त इसी पर जलाया या इसी में दफन किया जाता है।

   भूमि के अनेक भौतिक रूप है। जैसे- मैदान, पर्वत, पठार, घाटियाँ और समुद्र तथा नीची तथा ऊँची भूमि । मनुष्य के सम्पूर्ण कार्य-चाहे वह आर्थिक हो या अनार्थिक भूमि पर ही सम्पन्न होते हैं। अतः सभी संसाधनों में भूमि संसाधन अधिक महत्त्वपूर्ण है।

 

प्रश्न 2. मृदा क्या है? मृदा निर्माण के कारकों के नाम लिखें ।

उत्तर: मृदा भूमि का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सभी मिट्टी मृदा नहीं है लेनिक सभी मृदा मिट्टी है। कुछ सेंटीमीटर गहराई तक की भूमि को ही मृदा कहते हैं, जिसमें हम कृषि कार्य करते हैं। उससे नीचे की मिट्टी मात्र मिट्टी ही है।

मृदा निर्माण के कारक निम्नलिखित हैं :

(क) उच्चावच या धराकृति,
(ख) मूल शैल या चट्टान,
(ग) जलवायु,
(घ) वनस्पति,

( ङ) जैव पदार्थ,
(च) खनिज कण तथा
(छ) समय।

 

प्रश्न 3. मृदा निर्माण की प्रक्रिया बताएँ ।

उत्तर: तापमान में बदलाव, प्रवाहित जल की क्रिया, पवन, हिमनद, अपघटन ऐसी प्रक्रियाएँ हैं, जो मृदा निर्माण में सहायता करती हैं। इस प्रक्रिया में जैविक एवं रासायनिक परिवर्तन भी मृदा निर्माण में महत्त्व रखती है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जैव और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थ भाग लेते हैं। जैव पदार्थ ह्यूमस की प्रमुखता है।

 

प्रश्न 4. मृदा कितने प्रकार की होती है? इसके वितरण पर भी प्रकाश डालें ।

उत्तर: मृदा के प्रकार और उनके वितरण निम्नलिखित हैं :

(i) जलोढ़ मृदा- जलोढ़ मृदा बाढ़ वाले मैदानी भागों में मिलती है। सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र आदि नदियों ने उत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्र में जलोढ़ मृदा को फैला रखा है। इसके अलावा राजस्थान तथा गुजरात में भी एक संकरी पट्टी के रूप में जलोढ़ मृदा पाई जाती है।

 

(ii) काली मृदा- जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है काली मृदा का रंग काला ही होता है। ऐसी मृदा में एल्युमीनियम एवं लौह यौगिक पाए जाते हैं। यह मृदा कपास की उपज के लिए काफी उपयुक्त होती है। इस कारण इस मृदा को काली कपासी मृदा भी कहते हैं। खासतौर पर ऐसी मृदा दक्कन पठार के लावा प्रदेशों में पाई जाती है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु राज्यों में भी यह पाई जाती है।

 

(iii) लाल एवं पीली मृदा- लाल एवं पीली मृदा का विस्तार प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी एवं दक्षिणी हिस्से में ग्रेनाइट तथा नीस जैसे रवेदार आग्नेय चट्टानों के टूटने से हुआ है। खासकर ऐसी मृदा वहाँ पाई जाती है, जहाँ 100 सेमी से कम वर्षा होती है। इसमें लोहा का अंश अधिक मात्रा में रहता है, इसी कारण इसका रंग लाल रहता है। जलयोजन के बाद इसका रंग पीला हो जाता है। ऐसी मृदा का विस्तार तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, आंध प्रदेश, उड़ीसा, छोटानागपुर और मेघालय में है।

(iv) लैटराइट मृदा- लैटराइट मृदा का विकास उच्च तापमान और अधिक वर्षों वाले क्षेत्रों में हुआ है। खासकर कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों में। इसमें ह्यूमस की मात्रा कम होती है। अधिक तापमान के कारण अपघटक वैक्टेरिया नष्ट हो गए रहते हैं। अपश्चय के कारण यह मृदा कठोर हो जाती है। इसमें लोहा और एल्युमीनियम के आक्साइड मिले होते हैं, जिससे इसका रंग लाल होता है। यदि तकनीक का सहारा लिया जाय तो चाय, कहवा और काजू के लिए यह मृदा उपयुक्त है।

 

(v) मरुस्थलीय मृदा- ऐसी मृदा बलूई किस्म की, ह्यूमस रहित, हल्का लाल या भूरे रंग की होती है। इसका विस्तार पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिम हरियाणा, दक्षिणी पंजाब तक में है। सिचाई और उर्वरकों की व्यवस्था से ऐसी मृदा में कपास, धान, गेहूँ, तेलहन आदि की अच्छी उपज हो पाती है।

 

(vi) पर्वतीय मृदा- अपने नाम के अनुरूप पर्वतीय मृदा पर्वतों और पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मृदा जटिल और विविधता वाली होती है। ऊँचे भागों में पाई जाने वाली मृदा मोटे कणों वाली है। जहाँ अधिक वर्षा होती हैं, वहाँ वर्षा वन पाए जाते हैं। सदाबहार वन निचले भागों में होते हैं। नदी घाटियों, नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों में पर्वतीय मृदा उपजाऊ भी होती है, जहाँ धान, आलू आदि उपजाए जाते हैं और फलो के बगान लगाए जाते हैं।

 

प्रश्न 5. भारत में भू-उपयोग के स्वरूप पर प्रकाश डालें ।

उत्तर: भारत में भू-उपयोग के दो प्रमुख कारक निर्धारित हैं। वे हैं :

(क) भौतिक कारक तथा (ख) मानवीय कारक ।

(क) भौतिक कारक- भू-आकृति, जलवायु, मौसम तथा मृदा भौतिक कारकों के अन्तर्गत आते हैं। शुद्ध बोये गए क्षेत्र के विस्तार की दृष्टि से देश के विभिन्न राज्यों में काफी विविधता है। पंजाब तथा हरियाणा इस विषय में काफी आगे है। वहाँ 80% भाग भूमि खेती में प्रयुक्त होती है। इसके विपरीत अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में मात्र 10% से भी कम भाग पर कृषि कार्य होता है।

   देश में पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए कुल भूमि के 30% भाग पर वनों का रहना आवश्यक है। लेकिन भारत में मात्र 20% भाग भूमि पर ही वन हैं जबकि 1952 में राष्ट्रीय वन नीति बनायी जा चुकी है। यह पर्यावरणीय विनाश का संकेत है।

 

(ख) मानवीय कारक- देश में दिनों-दिन जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है। बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए रिहायशी मकान तथा कृषि कार्य के लिए खेतों की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। इसकी पूर्ति के लिए निर्दयतापूर्वक वनों का विनाश किया जाता रहा है। वन संरक्षण कानून का भी कोई परवाह नहीं करता और वनों के किनारे के वृक्षों की लगातार कटाई होती जा रही है। वन घटते जा रहे हैं और गाँव, टोला बढ़ते जा रहे हैं। भूमि संरक्षण तथा प्रबंधक के मानकों की लगातार अवहेलना हो रही है। संतोष की बात है कि किसी-किसी ग्राम पंचायत क्षेत्रों में नये पेड़ लगाए भी जा रहे हैं। सड़कों के किनारे तथा रेलों के किनारे पेड़ लगाने की प्रथा जोर पकड़ रही है। खेत के मेड़ों पर भी वृक्ष लगाए जा रहे हैं।


The   End 

Please  share  this  article  as  much  as  possible .
कृप्या इस लेख को अधिक - से - अधिक शेयर करदें ।