Page 538 Class 10th Non - Hindi Book Solution पाठ - 15 दीनबन्धु 'निराला'
पाठ - 15 दीनबन्धु 'निराला'
प्रश्न 1. निराला को 'दीनबन्धु' क्यों कहा गया है ?
उत्तर: "निराला" जी सदैव दीन-दुखियों
की सेवा में तत्पर रहा करते थे। गरीबों को स्वजन की तरह स्नेहपूर्वक मदद करना उनको
प्रकृति ओर से प्राप्त था। लंगड़े-लूले, अन्धे अपाहिज लोगों को अन्न-वस्त्र
देकर संतुष्ट कर देना उनका स्वभाव था।
लोग उन्हें
"दीनबन्धु" कहकर पुकारते थे। जो व्यक्ति दीन-दुखियों, पीड़ितों
के पास जा-जाकर मदद करता हो, क्या वह मानव भगवान दीनबन्धु के समान
"दीनबन्धु" कहलाते का अधिकारी नहीं। उपरोक्त अपने विशिष्ट गुणों के कारण
ही उन्हें "दीनबन्धु" कहा गया है।
प्रश्न 2. निराला सम्बन्धी बातें लोगों को अतिरंजित क्यों जान
पड़ती हैं?
उत्तर: याचकों के लिए कल्पतरू
होना, मित्रों के लिए मुक्त हस्त दोस्त-परस्त होना, मित्रों और अतिथियों के
स्वागत सत्कार में अद्वितीय हौसला दिखाने वाले, लंगड़े-लूले, अन्धे, दीन जनों
को खोज खोजकर मदद देने वाले निराला सम्बन्धित बातें लोगों को अतिरंजित जान पड़ती है।
क्योंकि
उपरोक्त गुणों का होना आसान नहीं। धनी लोग तो बहुत होते हैं लेकिन निराला जिस भाव से
मदद दीनों को करते थे वह आम लोगों को अतिरंजित करने वाला ही है।
प्रश्न 3. निम्न पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए
(क) “जो रहीम
दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होय ।
उत्तर:
जो व्यक्ति
गरीबों को देखता है,
उसको मदद देता है वह व्यक्ति दीनबन्धु भगवान की तरह हो जाता
है।
(ख) “पुण्यशील
के पास सब विभूतियाँ आप ही आप आती हैं।"
उत्तर:
जो व्यक्ति पुण्यशील होते हैं। जो उदार प्रवृत्ति के लोग होते हैं। उनके पास सब प्रकार
की विभूतियाँ (सुख-सम्पदा) स्वयं पहुँच जाती हैं। अर्थात् पुण्यात्मा को भगवान पुण्य
करने के लिए सब कुछ दे देते हैं।
(ग) “धन उनके
पास अतिथि के समान अल्पावधि तक ही टिकने आता था।"
उत्तर:
"निराला" जी इतने उदार प्रवृत्ति के थे कि जब-जब धन का आय हुआ तब-तब दौड़-दौड़कर, खोज-खोजकर
दीनों की मदद में वे खर्च कर देते थे। इसलिए आज का आया पैसा आज ही खत्म कर देना
व्याकरण
श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द : उच्चारण, मात्र
या वर्ण के साधारण बदलाव के बावजूद सुनने में समान परन्तु भिन्न अर्थ देनेवाले शब्द
को श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द कहते हैं।
जैसे:
दिन = दिन।
दीन = गरीब ।
निम्नलिखित श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द युग्मों का अर्थ लिखिए
1. समान = बराबर ।
सम्मान =
प्रतिष्ठा ।
2. केवल
= एक ही।
कैवल्य =
एकता का भाव।
3. बन = बनना ।
वन =
जंगल ।
4. भगवान
= ईश्वर ।
भाग्यवान = भाग्यशाली।
5. छात्र
= विद्यार्थी ।
छत्र =
छाता ।
6. अन्य = दूसरा ।
अन्न =
भोजन का अन्न ।
7. द्रव्य
= धन-पैसा ।
द्रव =
तरल पदार्थ ।
8. जगत्
= संसार ।
जगत =
कुएँ के चारो ओर बना चबूतरा ।
9. अवधी
= भाषा ।
अवधि =
समय ।
10. क्रम
= एक के बाद एक।
कर्म =
कार्य ।
11. आदि = इत्यादि ।
आदी =
खाने की एक वस्तु ।
12. चिंता
= सोचना ।
चिता =
मृतक को जलाने के लिए श्मशान में रखे गये लकड़ी के ढेर
जिस पर मृतक को जलाया जाता है।
अनेकार्थक शब्द- कुछ ऐसे शब्द प्रयोग में आते
हैं, जिनके अनेक अर्थ होते हैं हैं। प्रसंगानुसार इनके अर्थ भिन्न-भिन्न होते हैं।
जैसे:
1. मन - मेरा मन करता है
कि मनभर चावल खरीद लूँ।
2. हर – हर व्यक्ति
को कोई हर नहीं सकता है।
3. कर - वह अपने कर से
पुस्तक वितरक कर दिया। CORAS
4. अर्थ - आज के अर्थ युग
में थोड़ा धन कोई अर्थ नहीं रखता।
5. मंगल - मंगल दिन भी मेरा
मंगल ही रहेगा।
6. पास - तुम्हारे पास
वाली लड़की क्या परीक्षा में पास कर गई।
7. काल - वह अल्पकाल में
ही काल के गाल में चला गया।
8. पर - चिड़िया के पर
कट गये, पर वह जीवित था।
इन्हें जानिए
प्रस्तुत
पाठ में लेखक ने निराला के लिए 'दीनबंधु' विशेषण का प्रयोग किया
है। कुछ अन्य प्रतिष्ठित विभूतियों से संबंधित विशेषण इस प्रकार हैं
विशेषण - प्रतिष्ठि
विभूतियाँ
1. कथा-सम्राट
- मुंशी प्रेमचन्द
2. मैथिल
कोकिल - विद्यापति
3. भारत
कोकिला - सरोजनी नायडू
4. देशरत्न
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
5. लोकनायक
- जयप्रकाश नारायण
दीनबन्धु ‘निराला’- सारांश
संक्षेप-आधुनिक
हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” जी को दीनबन्धु “निराला” कहा जाता है। सचमुच में दीनबन्धु थे। दीन-दुखियों पीड़ित के साथ बन्धुत्व की भावना
रखने वाला उसका – यथोचित सेवा, सहायता करने वाला ही दीनबन्धु कहला सकता है।
महाकवि
रहीम ने तो दीनबन्धु को दीनबन्धु भगवान कहा है-जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होय । जो निराला जी
पर अक्षरश: सही बैठता है। वे दीनों पीड़ितों को खोज-खोजकर सेवा सहायता किया करते थे।
भगवान ने आकर्षक व्यक्तित्व के साथ उदार मन भी “निराला” जी को प्रदान किया था। स्वयं भोजन करने वक्त भी यदि कोई याचक
आ जाता तो अपना भोजन याचक को खिलाकर स्वयं तृप्त हो जाते थे । साहित्य साधना करने के
कारण अर्थाभात तो सदैव रहा ही लेकिन जो कुछ भी आय होता उसे गरीबों में बाँटकर उन्हें आनन्द आता था । वे भले स्वयं पुराना
कपड़ा पहने हों लेकिन निर्वस्त्र . दीन को देख वे नया वस्त्र ही दे दिया करते थे ।
दीनों की सहायता के कारण ही उनके घर में गद्दा आदि आरामदायक उपस्कर नहीं खरीद पाये।
. परमात्मा ने उनकी मनोवृत्ति और प्रवृत्ति समझकर ही कलकत्ता के श्री रामकृष्ण मिशन
“वेलूर मठ” में सेवा के लिए नियुक्त किया था।
“निराला” जी “यथा नियुक्तऽस्मि तथा करोमिं” के कथन को पूर्णत: पालन किया करते थे। प्रतिवर्ष वेलूर मठ में
परमहंस जी तथा विवेकानन्द जी की जयन्ती के अवसर पर दीन बन्धुओं (दरिद्रनारायणों) के
भोजन कराने वक्त पूर्णत: दीनबन्धु दिखते थे। बड़े लगन और प्रेम से दीनों को भोजन कराते
देख सब लोग उन पर मुग्ध हो जोते थे। “निराला” जी की मातृभाषा हिन्दी थी लेकिन बंगाली भाषा भी मातृभाषा के
समान ही बोलते थे जिसके कारण बंगाली लोग उन्हें बंगाली समाज का ही आदमी मान उनसे कवीन्द्र
“रवीन्द्रनाथ” के गीत सुनकर प्रसन्न हो जाते थे।
आकर्षक
रूप, लम्बे-तगड़े शरीर, सुन्दर स्वास्थ्य विलक्षण मेघाशक्ति, ‘ ‘मनोहर आवाज, दयाई स्वभाव चिन्तनशील मस्तिष्क, सुहावनी लुभावनी आँखें . सुन्दर
अनार की तरह दन्तपंक्ति धुंघराले बाल छोटा मुख-विवर, पतली होठ, चौड़ी छाती इत्यादि सब प्रकार से भगवान ने
उनको आकर्षक बना दिया था। लेकिन वे विषय-वासना से बिल्कुल दूर रहे। साहित्य साधना के
इच्छुक नर-नारी
प्राय: उनके इर्द-गिर्द रहा करते । लेकिन वे किसी को आँख उठाकर भी नहीं देखते थे।
देश की
आर्थिक विषमता पर यदि वे कभी बोलते थे तो वे अत्यन्त उग्र साम्यवादी जैसा प्रतीत होते
थे। जबकि उग्रता रूपी अवगण उनमें लेश मात्र भी नहीं था।
कलकत्ता
जैसा शहर जहाँ धनकुवेरों (धनवानों) की कमी नहीं था लेकिन लँगड़े-लूले, अन्धी कोढ़ी और निकम्मे दीनबन्धु
के प्रति ध्यान देने वाले केवल “निराला” जी थे। जबकि स्वस्थ व्यक्ति की सहायता करने को वे उन्मुख नहीं थे।
लेकिन
जब कोई माँग देता जो चीज माँग देता “निराला” जी उसकी याचना पूर्ण करने की कोशिश करते थे। उपलब्ध नहीं होने
पर हाथ जोड़कर ही सबको संतुष्ट कर दिया करते थे। भले उनके पास पैसों की कमी हो लेकिन
दीनों के मन को आनन्दित करने में ही आनन्द प्राप्त करते थे।
कभी-कभी
तो लालची आदमी भी उनके दान-शील स्वभाव से आकर्षित होकर लाभ पा लेता था लेकिन उनके मन
को कभी ठेस नहीं पहुँचा।
इस प्रकार
कहा जा सकता है कि–’निराला’ जी अपनी आवश्यकता को भूलकर दूसरों की आवश्यकता पूरा करने में आनन्द पाते थे।
निराला
की उदारता से प्रभावित कलकत्ता के रिक्शे वाले हो या ताँगावाले सभी साग्रह उनको बिठाते
थे। रास्ते के गरीब लोग भी उन्हें चलते-फिरते आशीष दिया करते थे।
धन्य थे ‘निराला’ जी साहित्य जगत में उनके जैसा विशिष्ट गुण वाले और आचरण वाले कवि या लेखक नहीं दिखते। . जिस व्यक्ति में अन्य लोगों से विशिष्ट गुण ही वैसे लोगों का स्मरण करना ईश्वर की दी गई वाणी को सार्थक करना है।