Page 542 Class 10th Non - Hindi Book Solution पाठ - 19 जननायक कर्पूरी ठाकुर

पाठ - 19 जननायक कर्पूरी ठाकुर

प्रश्न 1. कर्पूरी ठाकुर अपने परिजनों को प्रतीक्षा करने के लिए क्यों कहते

उत्तर: संभवतः कर्पूरी ठाकुर के परिजनों की यह आकांक्षा होगी कि कर्पूरी पढ़-लिखकर हमें गरीबी से निजात दिलायेगा। सारे सुख-साधन प्राप्त होंगे। लेकिन जननायक के लिए सम्पूर्ण देश परिवार था। उन्होंने देश की जनता को पराधीनता की बेड़ी में जकड़ा देखा जो उनके लिए असहनीय था। इसीलिए उन्होंने अपने अल्फाज में कहा था जब तक देश के प्रत्येक निवासी

को सम्मानजनक और सुविधासम्पन्न स्वाधीन जीवन-यापन का अवसर नहीं मिलेगा, तब तक मेरे परिजनों को भी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

 

प्रश्न 2. मैट्रिक के बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्हें कहाँ और किस प्रकार जाना पड़ता था ?

उत्तर: मैट्रिक परीक्षा पास कर उच्च शिक्षा के लिए दरभंगा के चन्द्रधारी मिथिला कॉलेज में दाखिला पाया जहाँ उनको प्रतिदिन पहुँचने के लिए कुछ दूर पैदल तथा 50-60 किलोमीटर दूर मुक्तापुर से दरभंगा ट्रेन से जाना-आना पड़ता था।


प्रश्न
3. कर्पूरी ठाकुर को कौन-कौन कार्य करने में आनन्द मिलता था ?

उत्तर: कर्पूरी ठाकुर को चरवाही करने, ग्रामीण गीत गाने, डफली बजाने तथा पीड़ितों की सेवा करने में आनन्द आता था।


प्रश्न
4. सचिवालय स्थित कार्यालय में पहले दिन उन्होंने कैसा दृश्य देखा तथा उस पर उन्होंने क्या निर्णय लिया?

उत्तर: 1952 में जब विधायक बने थे तो कर्पूरी जी ने सचिवालय स्थित अपने कार्यालय के लिफ्ट पर लिखा देखा- "Only for Officers" यह देखकर सचिवालय में इस सामंती प्रथा को समाप्त कर आमलोगों के लिए लिफ्ट का प्रयोग करवाया।

 

जननायक कर्पूरी ठाकुर - सारांश

जीवनी गरीबों के मसीहा, विलक्षण व्यक्तित्व के धनी जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी, 1921 को पितौझिया गाँव, जिला-समस्तीपुर, बिहार में हुआ था। . इनके पिता गोकुल ठाकुर एवं माता रामदुलारी देवी थी। गरीब परिवार के बच्चों की तरह इनका बाल्यकाल खेल-कूद तथा पशुओं के चराने में बीता ।

6 वर्ष की आयु में 1927 ई. में इनका विद्यारम्भ गाँव के पाठशाला से हुआ। पाठशाला से आने के बाद भी वे पशुओं को चराते थे। चरवाही में ग्रामीण गीतों का उपयोग भी करते थे । गीत गाने के साथ डफली बजाने का भी शौक था जो विधायक बनने के बाद भी शौक बना रहा।

1940 में मैट्रिक परीक्षा पास कर इन्टर की पढ़ाई के लिए 50-60 किलोमीटर दूर दरभंगा में नामांकन करवाया। कुछ दूरी पैदल फिर रेल से प्रतिदिन कॉलेज किया करते थे।

1942 में आई. ए. परीक्षा उत्तीर्ण कर स्नातक में नामांकन करवाया लेकिन 1942 की अगस्त-क्रान्ति से वे बच नहीं सके । क्रांति में सक्रिय भागीदारी देने लगे।

उन्होंने अपने परिजनों को प्रतीक्षा करने के लिए अपने शब्दों में कहा था-हो सकता है कि विद्याध्ययन के पश्चात् मुझे कोई पद प्राप्त हो जाय । मैं बहुत आराम और ऐश-मौज में दिन बिताऊँ। बड़ी कोठी, घोड़ी-गाड़ी, नौकर इत्यादि दिखावटी के सभी समान मुझे उपलब्ध हो । पर मुल्क का भी मुझ पर कुछ दावा है । भारत-माता स्वतंत्रता की पीड़ा से कराह रही है और मैं पढ़ाई जारी रखू यह मुमकिन नहीं । जब तक देश के प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक और सुविधा सम्पन्न स्वाधीन जीवन-यापन करने का अवसर नहीं मिलेगा तब तक. मेरे परिजनों को प्रतिक्षा करना होगी।

1942 में पढ़ाई छोड़ जयप्रकाश नारायण के आजाद दास्ताके सदस्य बन गये । आर्थिक स्थिति से निजात पाने के लिए उन्होंने 30 रुपये के वेतन पर गाँव के स्कूल में प्रधानाध्यापक के पद पर नौकरी की। दिन में नौकरी और रात में आजाद दस्ताके कार्य बखूबी निभाने लगे। 23 अक्टूबर, 1943 को रात्रि में गिरफ्तार होकर पहली जेल-यात्रा की। दरभंगा जेल पुनः भागलपुर जेल में भी कुछ दिनों तक जीवन बिताया।

स्वतंत्रता के बाद 1952 में जब प्रथम आम चुनाव हुआ तो कर्पूरी ठाकुर ताजपुर (समस्तीपुर) विधान सभा क्षेत्र में सोशलिस्ट पार्टी की ओर भारी बहुमत से विधायक चुने गये तथा 1988 तक विधान सभा में रहे। इस दौरान वे विधान सभा के कार्यवाहक अध्यक्ष, विरोधी दल के नेता, उप मुख्यमंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री बने।

जननायक को गरीब एवं पीड़ितों की सेवा में बड़ा आनन्द आता था। एक बार 1957 की बात है जब गाँवों का दौरा कर रहे थे। उसी दौरान उन्होंने देखा कि एक आदमी हैजा से पीड़ित है और मरने की स्थिति में है। अस्पताल -5-6 किलोमीटर दूर है। यातायात का कोई साधन नहीं । कर्पूरी जी ने उस पीड़ित को अपने कंधे पर उठाकर दौड़ते हुए चलकर अस्पताल पहुँचाया था। . 1952 की ही बात है जब उन्होंने विधायक बन सचिवालय में पहुंचे तो लिफ्ट पर लिखा देखा-“Only for Officers” यह देखकर ही उन्हें सचिवालय में सामंती प्रथा की बू आ गई और वे इस प्रथा को अंत कर आम लोगों को लिफ्ट से आने-जाने के लिए प्रयोग करवाया।

वे 1967 में उप मुख्यमंत्री, 1970 में और 1977 में मुख्यमंत्री पद को विभूषित किया । दलगत नीति के कारण 12 अगस्त, 1987 को विपक्ष के नेता के पद से इनको हटा दिया गया। 17 फरवरी, 1988 को हृदयाघात के कारण इनकी मृत्यु हो गई।